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Sunday, 22 October 2017

बादल

विशाल नभ में
विचरता बादल
ढूंढे है छोर...
जब ना मिले
तो 'व्याकुल' होकर
तके धरा की ओर...
कहीं पाता
बारिश की बाट
जोहता किसान...
तो कहीं
बाढ़ की विभिषिका
से जूझता इंसान...

कहीं दिखती वसुंधरा
हरी-भरी...
कहीं मीलों फैला
रेगिस्तान...
कहीं दिखते बच्चे
तैरते तरणताल में...
कहीं रोते-बिलखते
भूख से बेहाल से...
कहीं एक प्रेमी
विरह में आँसू बहाता...
कहीं किसी युगल को
एक-दूजे के प्यार में
सराबोर पाता...

भ्रम में बादल
स्वयं को पाता...
धरा के निमंत्रण को
ठुकरा नहीं पाता...
विचार मग्न हो
धरती पे आता...
आस बनकर
बरस जाता...
ज़मीन को
आसमां से मिलाता...

#व्याकुल

तुम चुप थी उस दिन

अज़नबी था 
जब तुमसे पहली बार मिला था...
बातों-मुलाकातों का दौर
फिर तुम संग बढ़ चला था...
तुमसे मिले बगैर
मेरा ना कोई दिन ढला था...
हाथ तुम्हारा थामे 
मैं हर एक कदम चला था...
तुम्हें संजोकर आँखों में
मेरा तो हर ख़्वाब पला था...
साथ हमेशा दोगी
यही तुमने हर दिन कहा था...
तुम चुप थी उस दिन
पर वो आँखों में क्या था...
बहने को था आतुर
पर अधरों में अटका था...
ख़त थमा कर हाथों में
मुझसे जैसे वक्त मुड़ा था...
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का आँचल
मुझ पर आखिरी बार उड़ा था...
टूटा था खुद में मैं पूरा
उम्र भर फिर ना जुड़ा था...

#व्याकुल

ज़िन्दगी

क्या प्राणवायु आपूर्ति
हुई थी बाधित
या यूँ ही शिशुओं
का दम घुटा था...
क्या रेलमार्ग
हो गए हैं शापित
या यात्रियों का
दिन बुरा था...
क्या लुप्त होती
जा रही संवेदना
या यूँ ही युवतियों का
स्त्रीत्व छिना था...
क्या सुरक्षा देश की
है सर्वोपरि
या यूँ ही सीमा पर शव
सैनिक का गिरा था...
'ज़िंदगी'...
तुम चुप थी उस दिन
पर वो आँखों में क्या था...
हारी थीं तुम स्वयं से
या फिर
मानवता से
विश्वास उठा था...।

#व्याकुल

Saturday, 21 October 2017

तुम से तुम तक

'तुम'...
मैंने जब
पहली बार कहा था
तुम्हें कितना
सुखद लगा था...
पता नहीं क्यों
'आप' बेगाना
'तुम' अपना सा
लगता है...
तुम्हें भी तो
यही लगा था...
चंद मुलाकातों में
'तुम' मेरी हो गई थी
और मैं तुम्हारा...
तुमसे जुड़ी
हर बात मुझे
तब भी भाती थी
और आज भी...
तुम्हारी बातें
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारी मुस्कान...
जानती हो क्यों
क्योंकि ये मुझे
अकेला नहीं
होने देतीं...
तब भी
साथ होती हैं
जब 'तुम'
संग नहीं होती...
सच कहूँ
'तुम' ने मुझे
सब कुछ दिया
मैं रिक्त था
मुझे 'पूर्ण' किया...
मैं अधूरा था
संपूर्ण किया...
मेरा यह
जीवन है
'तुम' से
'तुम' तक...

#व्याकुल

दीपावली

आओ मिल के लगाएँ पंक्तियाँ
हम उन दियों की, 
स्नेह-आशीष हों समेटे 
जो अपने प्रियों की, 
नहीं दरकार है हमें 
राजनैतिक जुमलुओं की, 
वैमनस्य के अंधेरे को करे दूर
लहर चले ऐसे जुगनुओं की, 
भूखे पेट में देने को निवाले 
बहे ना धार आंसुओं की, 
भेंट गरीबी के ना चढ़े 
नन्हीं आरजूओं की, 
प्रगति पथ पर बढ़ने में ना 
हो कमी रोशनियों की, 
तभी होगी संपन्न सबकी 
दीपावली खुशियों की |

#व्याकुल 

Sunday, 26 March 2017

विश्व कविता दिवस

लेखनी जात-पात ना जाने
मानवता को सर्वोपरि माने,


थमी जिनके हाथ वे नहीं सयाने
वे तो बस हैं भाव के दीवाने,


कभी तो लिखने पर पाएँ ताने
कभी बन जाएँ उनके फ़साने,


ग़ज़ल सुने कोई दिल बहलाने
पढ़े कविता कोई मुस्कुराने,


कहानी बुनने के आए ज़माने
होठों पे गूंजेंगे अब नए तराने,


सृजनता के नए आयाम गर हों आजमाने
आओ थामें वो दामन जो है 'आज सिरहाने'

#विश्व कविता दिवस #२१ मार्च २०१७
#
व्याकुल

नज़राना

मत नाप कद से मेरे तू इस दिल का इलाका
देख गौर से मैं हूँ छोटा पैकेट बड़ा धमाका।

मोहब्बत में सलीम की क्यों तू ऐश्वर्या बनती है
सिनेमा में आज भी फिल्म बिग बी की चलती है।

देख कर तुझे मेरी तबियत ऐसे मचलती है
हाथ में से कोई आईसक्रीम ज्यूँ पिघलती है।

सलीम को अपनाने का आइडिया तेरा फिजूल है
गर्मी जब सताए है तो काम आए डरमी कूल है।

कर ले नज़राना कुबूल अब तो मेरे प्यार का
नाम तेरे कर दूँगा मैं वाउचर बिग बाजार का।

मिसाल

जो मुझे दिखता है
वही लिखता हूँ
कुछ आपको दिखाता हूँ
सभागार ले चलता हूँ..1




संचालक के रूप में
मैंने कमान हाथ में ली
विषय स्पष्ट करने को
फिर चर्चा आरंभ की..3




डॉक्टर सबसे पहले आए
बोले अब क्या हम फरमाए
ईलाज सबका कर देते हैं
फला तो फीस ले लेते हैं..5




मंच था सजा हुआ
मजमा सा लगा हुआ
कोहनी मसनद पे टेके थे
कुछ बुद्धिजीवी बैठे थे..2




मंच पर उपस्थित महोदय
अपना अनुभव साझा करें
समाज हेतू की गई
कोई मिसाल पेश करें..4






शिक्षक बोले हाल बुरा है
शिष्यों का स्तर गिरा है
सभी निःशुल्क पढ़ते हैं
उत्तीर्ण होने पे फीस देते हैं..6
वकील साहब हताश हैं
करीबी उनके बदमाश हैं
पैरवी उनसे ही करवाते हैं
हारने पर धमकाते हैं..7




अंत में समाजसेवी आए
सबके अनुभव से हर्षाए
बोले मिसाल नहीं देनी है
एक ही बात कहनी है..9




बहिष्कृत होते आ रहे
अब बदलाव ला रहे
स्वयं को सिद्ध कर रहे
मुख्य धारा से जुड़ रहे..11





खोखली उपलब्धियाँ रचते हैं
हम स्वयं को छलते हैं
विषमताओं में जो पलते हैं
वही मिसाल बनते हैं..13

#मबुंई #२१ जनवरी २०१७
#व्याकुल




अब बारी नेताजी की आई
दुःख से थी आँख डबडबाई
वोटर पैसे उनसे लेता है
वोट विरोधी को देता है..8




एक वर्ग जो हमसे संबद्ध है
अभिशप्त उनका प्रारब्ध है
सबका तिरस्कार सहते हैं
किन्नर सब उन्हें कहते हैं..10




हमारी तरह इंसान हैं
वे भी ईश्वर की संतान हैं
उनकी समृद्धि चाहता हूँ
वार्षिक अनुष्ठान करवाता हूँ..12







कैलेंडर

दीवार पे टंगा
कैलेंडर...
अंकों के खेल में
जूझता सा
उदासीन है आज
अहंकार भरा
मुखर विरोधी
बदलाव का...
आज बदलेगा
उसका वो अंक
जो ३६६ दिन से
बदला नहीं...
हठी है
बदलना नहीं चाहता...
जड़ रहना चाहता है
जैसे मनुष्य...1

कुछ अंक हैं
जो बदलते हैं
प्रति पल
प्रति दिन
प्रति माह...
सरल हैं
लचीले भी
बदलना जानते हैं...
मनुष्य क्यों नहीं
सीखते अंकों से
विनम्रता ...2


अंक दस ही हैं
० से ९ तक
ज्यादा नहीं हैं...
किन्तु स्वार्थी भी
नहीं...
बदलते हैं
स्वयं को
कदा्चित दूसरों
की प्रसन्नता हेतू...
मनुष्य क्यों नहीं
बदलते स्वयं को
अपनों के लिए...3

कैलेंडर का
वो हठी अंक
भी बदलता है
वर्ष में एक बार...
अहंकार अंक
में नहीं
अपितु उसकी
स्थिति में है...
मनुष्य को
आभास क्यों नहीं
स्थिति-परिस्थिती...
सदैव एक सी
नहीं रहतीं
बदलती हैं
निरंतर...4
जो बदलना
जानते हैं
टिकते हैं
जो बदलते नहीं
रिसते हैं...
मनुष्य छोड़े
अहं को
बदलें स्वयं को...
सोच को
विचारों को
अंक बने
कैलेंडर नहीं...5

#मुंबई #३१ दिसंबर २०१६
#व्याकुल

Wednesday, 11 May 2016

दूरियाँ

दूरियों में नज़दीकी बनाए रखना
दुश्मनी में एक दोस्ती बनाए रखना
यूँ तो लहरों ने सदी ही बेवफाई की है
दिल की कश्ती को मांझी से बचाए रखना।


# २२ जनवरी २०१५
# व्याकुल

Monday, 9 May 2016

एक क़तरा

एक क़तरा हूँ कुछ तो है पहचान मेरी
खुद से बिछुड़ा तो समुन्दर हो जाऊंगा।

एक आँस हूँ मैं है मुझमें अभी साँस बाकी
छोड़ा जो हौसला एक पल में बिखर जाऊंगा।

एक जाम हूँ मैं मुझमे है अभी होश बाकी
छू लिया गर लबों से बेखुद हो जाऊंगा।

एक आँसू हूँ मुझमे है अभी जज़्बात बाकी
गिरा जो आँख से पत्थर ही हो जाऊंगा।

# १६ जनवरी २०१५
# व्याकुल

Saturday, 7 May 2016

नव वर्ष २०१५

समय की सराय से एक मुसाफिर की है रूखसत
और दूजे ने देखो चुपके से दे दी है दस्तक।

जाते हुए राही से हैं बेशुमार यादें वाबस्ता
नए हमसफर की आहट हो रही है आहिस्ता।

गुजरे जाते हैं लम्हे ख्वाब को हकीकत से रूबरू करने में
बीते जाती है जिंदगानी मुकम्मल हर आरजू करने में।

कुछ कर गुजरने की जुस्तजु में उलझा है हर मुसाफिर
जवानी कुरबान कर रहा बचपन सँवारने की खातिर।

नए मुसाफिर की परवाज़ नए आसमां छूने की है
नहीं थकेगा नहीं रुकेगा जिद खुद को आजमाने की है।

रहो खुश बाँटो खुशी मौसम कितने भी आएं जाएं
रहगुजर-ए-ख्वाब पर चले चलो कहे समय की सराए।

२९ दिसंबर २०१४

Wednesday, 4 May 2016

पठानकोट

फिर हम पर आघात हुआ है
हमला नहीं अक्समात् हुआ है
पठानकोट की सरज़मी पर
हमारे अपनों का रक्तपात हुआ है।

धर्म सैनिक का है देश की रक्षा
चरमराई फिर से आंतरिक सुरक्षा
इन हालात में कैसे दे पाएंगे हम
आगामी नस्ल को देशप्रेम की शिक्षा।

माँओं ने अपने लाल खो दिए
सुहागनों के सिंदूर उजड़ गए
राह तकते बच्चों की आँखों ने
मायूसी के संग सपने जोड़ लिए।

शांति-वार्ता की पहल का उपहास है
अमन का दमन करने का प्रयास है
हमारी सहनशीलता को आजमाने वालों
देश ना टूटने देंगे जब तक साँस में साँस है।

(पठानकोट के शहीदों को मेरी एक श्रद्धांजलि, ०४ जनवरी २०१६)

मकर संक्रांत २०१६

धनु राशि से मकर की ओर
ठंडी रातों से गर्म दिनों की ओर
संक्रांत को गरिमामय करता
बढ़ चला सूरज उत्तर की ओर।

पंजाब में जल उठी है लोहिड़ी
उत्तर में पक रही है खिचड़ी
दक्षिण में आ गया है पोंगल
पश्चिम में छाया उंधियो संग तिलगुल।

संक्रांत के संग खुशहाली है आई
उत्साहित किसान करेंगे फसल कटाई
निराशा भर विकारों को करके दूर
शुभ कार्य करने की घड़ी है आई।

आओ सपनों की पतंग बनाएं
मेहनत की उसमें डोर लगाएं
उन्मुक्त पवन की आस लिए
जीवन के आसमां को रंगीन बनाएं।

(मकर संक्रांत के पावन पर्व पर स्व-रचित पंक्तियों के संग आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं, १५ जनवरी २०१६)

करवा चौथ

व्रत करवा चौथ का नारी सदियों से मना रही,
पति की दीर्घायु की कामना युगों से करती आ रही,
गर्व के इस पर्व का पुरूष ना आभास कर पा रहा,
शान जो जीवन की है उसी को अपमानित कर रहा।

सृष्टी द्वारा रचे गए पुरूष-स्त्री के संख्या अनुपात को,
पुरूष असंतुलित कर रहा देकर बढ़ावा कन्या गर्भपात को,
करवा चौथ के व्रत की गरिमा तभी कायम रह सकेगी,
जब समाज में नारी की भूमिका पुरूष को गौरवान्वित कर सकेगी।

#मुंबई #३० अक्टूबर २०१५
#व्याकुल

हिंदू नूतन वर्ष २०१६

हिंदू नूतन वर्ष का आज हो रहा शुभ आरंभ है,
हमारी संस्कार-संस्कृति का यह एक प्रतिबिंब है,
गौरवमयी इस सभ्यता को स्वीकार हमारा वंदन हो,
जीवन में सदैव कुशलता-समृद्धि का अभिनंदन हो।

(संवत २०७३ के शुभ आगमन पर समस्त देशवासियों को स्व-रचित पंक्तियों के संग हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।)

गणतंत्र दिवस २०१६

अपना परिचय बाद में दूंगा पहले कुछ बतलाता हूँ,
नई बात कहने से पहले पुरानी को दोहराता हूँ,
१९४७ में ब्रिटिश दासता से देश की धरती मुक्त हुई थी,
बीत गए ६६ बरस जब गणराज्य की स्थापना हुई थी।

चीन-पाक के पाँच युद्धों ने देश की अखंडता को आजमाया है,
लेकिन दुश्मन ने हर युद्ध में राष्ट्र को अटल खड़ा पाया है,
प्रगति की राह थामे कितनी आगे  गए हैं सब,
कभी था लघु भारत १२५ करोड़ हो गए हैं अब।

साल के दो दिन बड़ी शान से तिरंगा सब फहराते हैं,
अगले दिन सांकेतिक तिरंगे को धरा पर गिरा पाते हैं,
सहनशीलता का देकर वास्ता देश को असहिष्णु ठहराते हैं,
कथनी-करनी के इस अंतर को बुद्धिजीवी बखूबी निभाते हैं।

लोगों के द्वारालोगों के लिएलोगों का तंत्र सभी रटा करते हैं,
चुनावी लूटेरों द्वारा लूटे जाने को फिर भी दोहराया करते हैं,
देश ने क्या दिया क्या नहीं बस यही सोचा करते हैं,
क्या कर जाएं देश के लिए यह विचार नहीं करते हैं।

सोच रहे हैं सभी की कौन है ये जो सब कुछ है जानता,
मैं वही संविधान हूँ जिसका जन्मदिन आज है पूरा देश मनाता/

हर इंसान का इक-दूजे से मानवता का नाता हो,
धर्मांधता का राष्ट्रीयता से ना कोई भी वास्ता हो,
आगे बढ़ने की चाह लिए सभी प्रगतिशील हों,
लेकिन विवेक का दामन थामे पहले संवेदनशील हों/

सदगुणों की फसल बो कर संस्कारों से उसको सींचें,
सत्कर्मों की खाद मिली तो सद्भाव के फल लगेंगे मीठे,
चरित्र का ऐसा निर्माण हो कि देश का कल्याण हो,
निजी हितों की पूर्ति से बढ़कर राष्ट्र पर न्योछावर प्राण हों।

शरीर के लिए आत्मा है जैसे राष्ट्र के लिए संविधान है,
समूचे विश्व के नक्शे पर संविधान ही राष्ट्र की पहचान है,
मैं से पहले हम होंहम से पहले समाज हो,
समाज से पहले संविधान और संविधान से पहले राष्ट्र हो।

स्वायत्ता-संप्रभुता-धर्मनिरपेक्षता सशक्त लोकतंत्र के स्तंभ हैं,
इनको संजोय रखने को सभी देशवासियों से आव्हान करबद्ध है।

(६६वें गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में समस्त भारतवासियों को स्व-रचित पंक्तियों के साथ कुछ विचार-मंथन के लिए२६ जनवरी २०१६)