अपना परिचय बाद में दूंगा पहले कुछ बतलाता हूँ,
नई बात कहने से पहले पुरानी को दोहराता हूँ,
१९४७ में ब्रिटिश दासता से देश की धरती मुक्त हुई थी,
बीत गए ६६ बरस जब गणराज्य की स्थापना हुई थी।
चीन-पाक के पाँच युद्धों ने देश की अखंडता को आजमाया है,
लेकिन दुश्मन ने हर युद्ध में राष्ट्र को अटल खड़ा पाया है,
प्रगति की राह थामे कितनी आगे आ गए हैं सब,
कभी था लघु भारत १२५ करोड़ हो गए हैं अब।
साल के दो दिन बड़ी शान से तिरंगा सब फहराते हैं,
अगले दिन सांकेतिक तिरंगे को धरा पर गिरा पाते हैं,
सहनशीलता का देकर वास्ता देश को असहिष्णु ठहराते हैं,
कथनी-करनी के इस अंतर को बुद्धिजीवी बखूबी निभाते हैं।
लोगों के द्वारा, लोगों के लिए, लोगों का तंत्र सभी रटा करते हैं,
चुनावी लूटेरों द्वारा लूटे जाने को फिर भी दोहराया करते हैं,
देश ने क्या दिया क्या नहीं बस यही सोचा करते हैं,
क्या कर जाएं देश के लिए यह विचार नहीं करते हैं।
सोच रहे हैं सभी की कौन है ये जो सब कुछ है जानता,
मैं वही संविधान हूँ जिसका जन्मदिन आज है पूरा देश मनाता/
हर इंसान का इक-दूजे से मानवता का नाता हो,
धर्मांधता का राष्ट्रीयता से ना कोई भी वास्ता हो,
आगे बढ़ने की चाह लिए सभी प्रगतिशील हों,
लेकिन विवेक का दामन थामे पहले संवेदनशील हों/
सदगुणों की फसल बो कर संस्कारों से उसको सींचें,
सत्कर्मों की खाद मिली तो सद्भाव के फल लगेंगे मीठे,
चरित्र का ऐसा निर्माण हो कि देश का कल्याण हो,
निजी हितों की पूर्ति से बढ़कर राष्ट्र पर न्योछावर प्राण हों।
शरीर के लिए आत्मा है जैसे राष्ट्र के लिए संविधान है,
समूचे विश्व के नक्शे पर संविधान ही राष्ट्र की पहचान है,
मैं से पहले हम हों, हम से पहले समाज हो,
समाज से पहले संविधान और संविधान से पहले राष्ट्र हो।
स्वायत्ता-संप्रभुता-धर्मनिरपेक्षता सशक्त लोकतंत्र के स्तंभ हैं,
इनको संजोय रखने को सभी देशवासियों से आव्हान करबद्ध है।
(६६वें गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में समस्त भारतवासियों को स्व-रचित पंक्तियों के साथ कुछ विचार-मंथन के लिए, २६ जनवरी २०१६)