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Saturday, 21 October 2017

तुम से तुम तक

'तुम'...
मैंने जब
पहली बार कहा था
तुम्हें कितना
सुखद लगा था...
पता नहीं क्यों
'आप' बेगाना
'तुम' अपना सा
लगता है...
तुम्हें भी तो
यही लगा था...
चंद मुलाकातों में
'तुम' मेरी हो गई थी
और मैं तुम्हारा...
तुमसे जुड़ी
हर बात मुझे
तब भी भाती थी
और आज भी...
तुम्हारी बातें
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारी मुस्कान...
जानती हो क्यों
क्योंकि ये मुझे
अकेला नहीं
होने देतीं...
तब भी
साथ होती हैं
जब 'तुम'
संग नहीं होती...
सच कहूँ
'तुम' ने मुझे
सब कुछ दिया
मैं रिक्त था
मुझे 'पूर्ण' किया...
मैं अधूरा था
संपूर्ण किया...
मेरा यह
जीवन है
'तुम' से
'तुम' तक...

#व्याकुल

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