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Sunday, 22 October 2017

ज़िन्दगी

क्या प्राणवायु आपूर्ति
हुई थी बाधित
या यूँ ही शिशुओं
का दम घुटा था...
क्या रेलमार्ग
हो गए हैं शापित
या यात्रियों का
दिन बुरा था...
क्या लुप्त होती
जा रही संवेदना
या यूँ ही युवतियों का
स्त्रीत्व छिना था...
क्या सुरक्षा देश की
है सर्वोपरि
या यूँ ही सीमा पर शव
सैनिक का गिरा था...
'ज़िंदगी'...
तुम चुप थी उस दिन
पर वो आँखों में क्या था...
हारी थीं तुम स्वयं से
या फिर
मानवता से
विश्वास उठा था...।

#व्याकुल

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