विशाल नभ में
विचरता बादल
ढूंढे है छोर...
जब ना मिले
तो 'व्याकुल' होकर
तके धरा की ओर...
कहीं पाता
बारिश की बाट
जोहता किसान...
तो कहीं
बाढ़ की विभिषिका
से जूझता इंसान...
कहीं दिखती वसुंधरा
हरी-भरी...
कहीं मीलों फैला
रेगिस्तान...
कहीं दिखते बच्चे
तैरते तरणताल में...
कहीं रोते-बिलखते
भूख से बेहाल से...
कहीं एक प्रेमी
विरह में आँसू बहाता...
कहीं किसी युगल को
एक-दूजे के प्यार में
सराबोर पाता...
भ्रम में बादल
स्वयं को पाता...
धरा के निमंत्रण को
ठुकरा नहीं पाता...
विचार मग्न हो
धरती पे आता...
आस बनकर
बरस जाता...
ज़मीन को
आसमां से मिलाता...
#व्याकुल
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