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Saturday, 7 May 2016

नव वर्ष २०१५

समय की सराय से एक मुसाफिर की है रूखसत
और दूजे ने देखो चुपके से दे दी है दस्तक।

जाते हुए राही से हैं बेशुमार यादें वाबस्ता
नए हमसफर की आहट हो रही है आहिस्ता।

गुजरे जाते हैं लम्हे ख्वाब को हकीकत से रूबरू करने में
बीते जाती है जिंदगानी मुकम्मल हर आरजू करने में।

कुछ कर गुजरने की जुस्तजु में उलझा है हर मुसाफिर
जवानी कुरबान कर रहा बचपन सँवारने की खातिर।

नए मुसाफिर की परवाज़ नए आसमां छूने की है
नहीं थकेगा नहीं रुकेगा जिद खुद को आजमाने की है।

रहो खुश बाँटो खुशी मौसम कितने भी आएं जाएं
रहगुजर-ए-ख्वाब पर चले चलो कहे समय की सराए।

२९ दिसंबर २०१४

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