समय की सराय से एक मुसाफिर की है रूखसत
और दूजे ने देखो चुपके से दे दी है दस्तक।
और दूजे ने देखो चुपके से दे दी है दस्तक।
जाते हुए राही से हैं बेशुमार यादें वाबस्ता
नए हमसफर की आहट हो रही है आहिस्ता।
नए हमसफर की आहट हो रही है आहिस्ता।
गुजरे जाते हैं लम्हे ख्वाब को हकीकत से रूबरू करने में
बीते जाती है जिंदगानी मुकम्मल हर आरजू करने में।
बीते जाती है जिंदगानी मुकम्मल हर आरजू करने में।
कुछ कर गुजरने की जुस्तजु में उलझा है हर मुसाफिर
जवानी कुरबान कर रहा बचपन सँवारने की खातिर।
जवानी कुरबान कर रहा बचपन सँवारने की खातिर।
नए मुसाफिर की परवाज़ नए आसमां छूने की है
नहीं थकेगा नहीं रुकेगा जिद खुद को आजमाने की है।
नहीं थकेगा नहीं रुकेगा जिद खुद को आजमाने की है।
रहो खुश बाँटो खुशी मौसम कितने भी आएं जाएं
रहगुजर-ए-ख्वाब पर चले चलो कहे समय की सराए।
२९ दिसंबर २०१४
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