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दीवार
पे टंगा
कैलेंडर...
अंकों के खेल में जूझता सा उदासीन है आज अहंकार भरा मुखर विरोधी बदलाव का... आज बदलेगा उसका वो अंक जो ३६६ दिन से बदला नहीं... हठी है बदलना नहीं चाहता... जड़ रहना चाहता है जैसे मनुष्य...1
कुछ
अंक हैं
जो बदलते हैं प्रति पल प्रति दिन प्रति माह... सरल हैं लचीले भी बदलना जानते हैं... मनुष्य क्यों नहीं सीखते अंकों से विनम्रता ...2 |
अंक दस
ही हैं
० से ९ तक
ज्यादा नहीं हैं... किन्तु स्वार्थी भी नहीं... बदलते हैं स्वयं को कदा्चित दूसरों की प्रसन्नता हेतू... मनुष्य क्यों नहीं बदलते स्वयं को अपनों के लिए...3
कैलेंडर
का
वो हठी अंक भी बदलता है वर्ष में एक बार... अहंकार अंक में नहीं अपितु उसकी स्थिति में है... मनुष्य को आभास क्यों नहीं स्थिति-परिस्थिती... सदैव एक सी नहीं रहतीं बदलती हैं निरंतर...4 |
जो
बदलना
जानते हैं
टिकते हैं जो बदलते नहीं रिसते हैं... मनुष्य छोड़े अहं को बदलें स्वयं को... सोच को विचारों को अंक बने कैलेंडर नहीं...5
#मुंबई #३१ दिसंबर २०१६
#व्याकुल |
# Meri Shayari Meri Kavita because it is purely my thoughts & views on situations, occasions & people...sometimes in the form of Hindi poem & Gazal, sometimes Stories. # # By signing onto my blog, you hereby agree that no part of my work may be reproduced, distributed or transmitted in any form or by any means, including electronic or mechanical methods without the prior written permission of the publisher/writer.
Sunday, 26 March 2017
कैलेंडर
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कविता
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