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Sunday, 26 March 2017

विश्व कविता दिवस

लेखनी जात-पात ना जाने
मानवता को सर्वोपरि माने,


थमी जिनके हाथ वे नहीं सयाने
वे तो बस हैं भाव के दीवाने,


कभी तो लिखने पर पाएँ ताने
कभी बन जाएँ उनके फ़साने,


ग़ज़ल सुने कोई दिल बहलाने
पढ़े कविता कोई मुस्कुराने,


कहानी बुनने के आए ज़माने
होठों पे गूंजेंगे अब नए तराने,


सृजनता के नए आयाम गर हों आजमाने
आओ थामें वो दामन जो है 'आज सिरहाने'

#विश्व कविता दिवस #२१ मार्च २०१७
#
व्याकुल

नज़राना

मत नाप कद से मेरे तू इस दिल का इलाका
देख गौर से मैं हूँ छोटा पैकेट बड़ा धमाका।

मोहब्बत में सलीम की क्यों तू ऐश्वर्या बनती है
सिनेमा में आज भी फिल्म बिग बी की चलती है।

देख कर तुझे मेरी तबियत ऐसे मचलती है
हाथ में से कोई आईसक्रीम ज्यूँ पिघलती है।

सलीम को अपनाने का आइडिया तेरा फिजूल है
गर्मी जब सताए है तो काम आए डरमी कूल है।

कर ले नज़राना कुबूल अब तो मेरे प्यार का
नाम तेरे कर दूँगा मैं वाउचर बिग बाजार का।

बंधन ३

माँ तेरा प्यार
ही मेरी
शक्ति है
किंतु ये धरा
मेरे अस्तित्व की
अभिव्यक्ति है...
ऋण चुकाने हेतू
यदि धरा पुकारेगी
तेरे आशीर्वाद से
सिंचित होकर
मैं आहूति
बन जाऊँगा
माँ का लाल
कहलाऊँगा।

बंधन २

क्यों रिश्ते
दिलों के
अंजान हुए
हुआ जब सामना
पशेमान हुए
बचपन में
जो सब
हम बाँट
लिया करते थे
बड़े होने पर
हमारे दरम्याँ
क्यों...
ज़मीं-आसमान हुए।

बंधन १

मोह जो
तुम्हे मुझसे है
धधकता है
अंगारे सा
भीतर तुम्हारे
और मुझमें
चिंगारी सा
डरता हूँ
कहीं सुलगता
ना रहे मुझमें
आजीवन
और...
छोड़ दे मुझे
भस्म होने को
तुम्हे मुक्त
करने को।

ख़्वाब - २

सोच मुक्त
हुई नहीं
जंजीरें
टूटी नहीं
परंपराएं
झूठी नहीं
मन की बात
कही नहीं
अपनों की
सुनी नहीं
नई कहानी
बुनी नहीं
राह हट के
चुनी नहीं
दिखता कोई
गुनी नहीं
क्यों ज़िंदगी
सुलझी नहीं।

ख़्वाब

तुम्हे चाहना
और पाना भी
तुम्हे देखते हुए
सँवरना भी
तुम्हारे संग
पलों का
गुजरना भी
तुम्हारी उपेक्षा को
भूलना भी
तुमसे जुड़कर
टूटना भी
तुम्हे पाकर
बिखरना भी
तुम्हे तुमसे
चुराना भी
तुम्हारे संग
जीना और
मर जाना भी।

इश़्क

तेरी यादों में इस कदर बिखरा
चाह कर भी सँवर नहीं पाता।

कर ना सका तिजारत इश़्क की
ज़बान देकर मुकर नहीं पाता।

दिल परिंदे सा कब तलक उड़े
क्यों ज़मीं पे शजर नहीं पाता।

क़ाफिर बन गया तिरे इश्क में
अब दुआ में असर नहीं पाता।

जुदाई में तिरी बेख़ुद हुआ
अब ख़ुशी की ख़बर नहीं पाता।

दिल मिरा खिला 'आज सिरहाने'
मुरझाता गर दर नहीं पाता।

मुहब्बत

दिल में तेरी मुहब्बत ऐसे दर्ज है
दौड़े रग़ों में बनकर जैसे मर्ज है।

झूम रहा हूँ जिसमें होकर सराबोर
जुनूं कि मिरे इश्क की ऐसी तर्ज है।

वजूद इस जहाँ में तुझसे ही पाया
ना चुका सकूँगा जो तेरा कर्ज है।

खुशनसीब हूँ तिरी निगरानी में जिया
अदा कर जाऊँगा जो मिरा फर्ज है।

गर वतन के लिए मिटना पड़ा 'व्याकुल'
हँसते हुए जान दे दूँ कैसा हर्ज है।

मिसाल

जो मुझे दिखता है
वही लिखता हूँ
कुछ आपको दिखाता हूँ
सभागार ले चलता हूँ..1




संचालक के रूप में
मैंने कमान हाथ में ली
विषय स्पष्ट करने को
फिर चर्चा आरंभ की..3




डॉक्टर सबसे पहले आए
बोले अब क्या हम फरमाए
ईलाज सबका कर देते हैं
फला तो फीस ले लेते हैं..5




मंच था सजा हुआ
मजमा सा लगा हुआ
कोहनी मसनद पे टेके थे
कुछ बुद्धिजीवी बैठे थे..2




मंच पर उपस्थित महोदय
अपना अनुभव साझा करें
समाज हेतू की गई
कोई मिसाल पेश करें..4






शिक्षक बोले हाल बुरा है
शिष्यों का स्तर गिरा है
सभी निःशुल्क पढ़ते हैं
उत्तीर्ण होने पे फीस देते हैं..6
वकील साहब हताश हैं
करीबी उनके बदमाश हैं
पैरवी उनसे ही करवाते हैं
हारने पर धमकाते हैं..7




अंत में समाजसेवी आए
सबके अनुभव से हर्षाए
बोले मिसाल नहीं देनी है
एक ही बात कहनी है..9




बहिष्कृत होते आ रहे
अब बदलाव ला रहे
स्वयं को सिद्ध कर रहे
मुख्य धारा से जुड़ रहे..11





खोखली उपलब्धियाँ रचते हैं
हम स्वयं को छलते हैं
विषमताओं में जो पलते हैं
वही मिसाल बनते हैं..13

#मबुंई #२१ जनवरी २०१७
#व्याकुल




अब बारी नेताजी की आई
दुःख से थी आँख डबडबाई
वोटर पैसे उनसे लेता है
वोट विरोधी को देता है..8




एक वर्ग जो हमसे संबद्ध है
अभिशप्त उनका प्रारब्ध है
सबका तिरस्कार सहते हैं
किन्नर सब उन्हें कहते हैं..10




हमारी तरह इंसान हैं
वे भी ईश्वर की संतान हैं
उनकी समृद्धि चाहता हूँ
वार्षिक अनुष्ठान करवाता हूँ..12







नव चेतना

क्यों नहीं होता
अंत...
चारों ओर फैली
पीड़ा का
वेदना का...
क्यों नहीं होता
आरम्भ
सच्ची संवेदना का...१

क्यों मनुष्य ही
शत्रु मनुष्य का
कब होगा आरम्भ
समर मानवता का...
कब होगा अंत
द्वेष वैमनस्य का
अब तो आरम्भ हो
प्रेम सौहार्द का...२

कब अंत होगा
पुरूष की
काम पिपासा का...
कब तलक होगा
चीर हरण
मान मर्दन
निर्भया का...
क्या नहीं
होगा आरम्भ
सम्मान नारी
और उसके
नारीत्व का...३
कैसी है यह
प्रगति
जिसके पथ
हम चल रहे...
आधुनिकता के
ढोंग से
एक दूजे को
छल रहे...
भोग विलासिता
का मद
सर्वत्र व्याप्त है
झूठे अहंकार से
मानव अभिशप्त है...४

क्या सत्य का
अभाव ही
असत्य का
प्रमाण है...
क्या प्रकाश का
ना होना ही
अंधकार की
पहचान है...५

आओ हम
मिलकर
उस दिवस का
आरम्भ करें...
जिसमें 
नव चेतना का
सूर्य...
कभी अस्त हो
जिसमें सत्य
असत्य से 
कभी परास्त हो...६

#मुंबई #०७ जनवरी २०१७
#
व्याकुल

'आज सिरहाने'

बचपन की
'
पाठशाला' में...
ये 'गुस्ताखियाँ' भी
करते रहे...
'
स्वलेख ओ सुख़न'
की कक्षा में
रख के सामने
'
किताबें'
'
दोस्त के नाम'
लिखी 'पुरानी चिट्ठी'
पढ़ते रहे...

इल्म की
'
रोशनी' में
बड़े होकर...
जब 'रूबरू'
ज़िंदगी के
'
रंगमंच' से हुए...

ख़्याल रख के
'
आज सिरहाने'
बुनने लगे
'
एक कहानी'
'
एक सौ एक'
'
शब्दों' में...
खोने लगे
'
चाय, ज़िंदगी'
'
और बारिश' में...

#व्याकुल

कैलेंडर

दीवार पे टंगा
कैलेंडर...
अंकों के खेल में
जूझता सा
उदासीन है आज
अहंकार भरा
मुखर विरोधी
बदलाव का...
आज बदलेगा
उसका वो अंक
जो ३६६ दिन से
बदला नहीं...
हठी है
बदलना नहीं चाहता...
जड़ रहना चाहता है
जैसे मनुष्य...1

कुछ अंक हैं
जो बदलते हैं
प्रति पल
प्रति दिन
प्रति माह...
सरल हैं
लचीले भी
बदलना जानते हैं...
मनुष्य क्यों नहीं
सीखते अंकों से
विनम्रता ...2


अंक दस ही हैं
० से ९ तक
ज्यादा नहीं हैं...
किन्तु स्वार्थी भी
नहीं...
बदलते हैं
स्वयं को
कदा्चित दूसरों
की प्रसन्नता हेतू...
मनुष्य क्यों नहीं
बदलते स्वयं को
अपनों के लिए...3

कैलेंडर का
वो हठी अंक
भी बदलता है
वर्ष में एक बार...
अहंकार अंक
में नहीं
अपितु उसकी
स्थिति में है...
मनुष्य को
आभास क्यों नहीं
स्थिति-परिस्थिती...
सदैव एक सी
नहीं रहतीं
बदलती हैं
निरंतर...4
जो बदलना
जानते हैं
टिकते हैं
जो बदलते नहीं
रिसते हैं...
मनुष्य छोड़े
अहं को
बदलें स्वयं को...
सोच को
विचारों को
अंक बने
कैलेंडर नहीं...5

#मुंबई #३१ दिसंबर २०१६
#व्याकुल

नया साल

आने को नया साल है
चारों ओर धमाल है
जोश में उबाल है
बदली सबकी चाल है
उठता एक सवाल है
क्या हर कोई खुशहाल है?







भ्रष्ट ने बुना जाल है
रोज़ हुआ मालामाल है
नेतागिरी एक टकसाल है
ख़ुद में एक कमाल है
ईमानदार ही कंगाल है
क्या यही नया साल है?











#मुंबई #३१ दिसंबर २०१६
#व्याकुल







कीमतों मे उछाल है
फसल खस्ता हाल है
किसान हुआ निढाल है
कर्ज़े से बेहाल है
जीना हुआ मुहाल है
कैसा ये नया साल है?







बदल रहा काल है
सोच में भाल है
बिखरी हुई ताल है
सब लगे जंजाल है
ये मंज़र फ़िलहाल है
ज़िंदगी का यही जमाल है
समझ ले किसकी मजाल है
जीवन हर पल नया साल है।