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Sunday, 26 March 2017

'आज सिरहाने'

बचपन की
'
पाठशाला' में...
ये 'गुस्ताखियाँ' भी
करते रहे...
'
स्वलेख ओ सुख़न'
की कक्षा में
रख के सामने
'
किताबें'
'
दोस्त के नाम'
लिखी 'पुरानी चिट्ठी'
पढ़ते रहे...

इल्म की
'
रोशनी' में
बड़े होकर...
जब 'रूबरू'
ज़िंदगी के
'
रंगमंच' से हुए...

ख़्याल रख के
'
आज सिरहाने'
बुनने लगे
'
एक कहानी'
'
एक सौ एक'
'
शब्दों' में...
खोने लगे
'
चाय, ज़िंदगी'
'
और बारिश' में...

#व्याकुल

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