बचपन की
'पाठशाला' में...
ये 'गुस्ताखियाँ' भी
करते रहे...
'स्वलेख ओ सुख़न'
की कक्षा में
रख के सामने
'किताबें'
'दोस्त के नाम'
लिखी 'पुरानी चिट्ठी'
पढ़ते रहे...
'पाठशाला' में...
ये 'गुस्ताखियाँ' भी
करते रहे...
'स्वलेख ओ सुख़न'
की कक्षा में
रख के सामने
'किताबें'
'दोस्त के नाम'
लिखी 'पुरानी चिट्ठी'
पढ़ते रहे...
इल्म की
'रोशनी' में
बड़े होकर...
जब 'रूबरू'
ज़िंदगी के
'रंगमंच' से हुए...
'रोशनी' में
बड़े होकर...
जब 'रूबरू'
ज़िंदगी के
'रंगमंच' से हुए...
ख़्याल रख के
'आज सिरहाने'
बुनने लगे
'एक कहानी'
'एक सौ एक'
'शब्दों' में...
खोने लगे
'चाय, ज़िंदगी'
'और बारिश' में...
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