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Sunday, 26 March 2017

नव चेतना

क्यों नहीं होता
अंत...
चारों ओर फैली
पीड़ा का
वेदना का...
क्यों नहीं होता
आरम्भ
सच्ची संवेदना का...१

क्यों मनुष्य ही
शत्रु मनुष्य का
कब होगा आरम्भ
समर मानवता का...
कब होगा अंत
द्वेष वैमनस्य का
अब तो आरम्भ हो
प्रेम सौहार्द का...२

कब अंत होगा
पुरूष की
काम पिपासा का...
कब तलक होगा
चीर हरण
मान मर्दन
निर्भया का...
क्या नहीं
होगा आरम्भ
सम्मान नारी
और उसके
नारीत्व का...३
कैसी है यह
प्रगति
जिसके पथ
हम चल रहे...
आधुनिकता के
ढोंग से
एक दूजे को
छल रहे...
भोग विलासिता
का मद
सर्वत्र व्याप्त है
झूठे अहंकार से
मानव अभिशप्त है...४

क्या सत्य का
अभाव ही
असत्य का
प्रमाण है...
क्या प्रकाश का
ना होना ही
अंधकार की
पहचान है...५

आओ हम
मिलकर
उस दिवस का
आरम्भ करें...
जिसमें 
नव चेतना का
सूर्य...
कभी अस्त हो
जिसमें सत्य
असत्य से 
कभी परास्त हो...६

#मुंबई #०७ जनवरी २०१७
#
व्याकुल

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