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Sunday, 26 March 2017

इश़्क

तेरी यादों में इस कदर बिखरा
चाह कर भी सँवर नहीं पाता।

कर ना सका तिजारत इश़्क की
ज़बान देकर मुकर नहीं पाता।

दिल परिंदे सा कब तलक उड़े
क्यों ज़मीं पे शजर नहीं पाता।

क़ाफिर बन गया तिरे इश्क में
अब दुआ में असर नहीं पाता।

जुदाई में तिरी बेख़ुद हुआ
अब ख़ुशी की ख़बर नहीं पाता।

दिल मिरा खिला 'आज सिरहाने'
मुरझाता गर दर नहीं पाता।

मुहब्बत

दिल में तेरी मुहब्बत ऐसे दर्ज है
दौड़े रग़ों में बनकर जैसे मर्ज है।

झूम रहा हूँ जिसमें होकर सराबोर
जुनूं कि मिरे इश्क की ऐसी तर्ज है।

वजूद इस जहाँ में तुझसे ही पाया
ना चुका सकूँगा जो तेरा कर्ज है।

खुशनसीब हूँ तिरी निगरानी में जिया
अदा कर जाऊँगा जो मिरा फर्ज है।

गर वतन के लिए मिटना पड़ा 'व्याकुल'
हँसते हुए जान दे दूँ कैसा हर्ज है।

मसीहा

यादें तुम्हारी आ बसीं कभी जो फ़ुर्सत में
कोई नज़राना सा मिला हाल-ए-ग़ुर्बत में।

तेरे आने के पहले दिल बंजारे सा फिरा
क़ैद ख़ुद में हो गया फिर तेरी उल्फ़त में।

महरूम रहा इस जहाँ की शानो-शौकत से
इक उम्र फिर जी लिया दिल तेरी क़ुर्बत में।

तेरे आग़ोश में मयस्सर जितने भी लम्हे हुए
जिए जाने को बहुत थे अहद-ए-फ़ुर्क़त में।

इस संगदिल जहाँ में ग़मज़दा रहा 'व्याकुल'
मसीहा तुम ना बन सके दम-ए-रूख़्सत में।

#मुंबई #२४ दिसंबर २०१६

आग़ोश

साँसें थमी रहीं इश्क के ज़ोश में
कभी नहीं रहा दिल ये होश में।

बेचैन सी रही तमाम हसरतें उम्र भर
सुकूँ ना मिला दिल--खानाबदोश में।

तराने आशिकी के फिजाँ में घुल रहे
सज ना सके तेरे लब--ख़ामोश में।

मुंतज़िर-ए-दीद को हो रहा 'व्याकुल  '
आरज़ू यही दम टूटे तेरे आग़ोश में।

#मुंबई #१७ दिसंबर २०१६

दूरी

दूर किसी से चले जाना ही क्या दूरी है
हासिल ये करने को नज़दीकी जरूरी है।

साथ दो कदम चलना भी था ना गवारा
रिश्ते जन्मों के हों तो ऐतबार जरूरी है।

सफर मीलों के यूँ तो अक्सर ही तय हुए
बात दिलों की जब हो एक उम्र जरूरी है।

पाने को मुहब्बत खुद को खुद से दूर किया
गर हो कोई बेवफा आँख में नमी जरूरी है।

#मुंबई #१९ नवंबर २०१६
#
व्याकुल

Saturday, 23 July 2016

इश्क

हर खुशी से दिल करे इन्कार सा
क्या ग़मों से कर बैठा इक़रार सा।

इश्क किया था हमने बेपनाह तुमसे
काश कर देते तुम कभी इजहार सा।

हम तो बावफा रहे उम्र भर लेकिन
उनके लिए प्यार था कारोबार सा।

दोस्ती से उठ गया भरोसा इस कदर
दुश्मनों पर होने लगा है ऐतबार सा।

चला गया जो कभी ना लौटने को
आँखें आज भी करे हैं इंतज़ार सा।

खोया पाया इतना कुछ इक उम्र में
मरना भी लगने लगा है दुश्वार सा।

- 'व्याकुल'
२२ जुलाई २०१६, मुंबई