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Saturday, 23 July 2016

इश्क

हर खुशी से दिल करे इन्कार सा
क्या ग़मों से कर बैठा इक़रार सा।

इश्क किया था हमने बेपनाह तुमसे
काश कर देते तुम कभी इजहार सा।

हम तो बावफा रहे उम्र भर लेकिन
उनके लिए प्यार था कारोबार सा।

दोस्ती से उठ गया भरोसा इस कदर
दुश्मनों पर होने लगा है ऐतबार सा।

चला गया जो कभी ना लौटने को
आँखें आज भी करे हैं इंतज़ार सा।

खोया पाया इतना कुछ इक उम्र में
मरना भी लगने लगा है दुश्वार सा।

- 'व्याकुल'
२२ जुलाई २०१६, मुंबई

2 comments:

  1. No one can describe ones unrequited love better than you. Beautiful sentiment!

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