साँसें थमी रहीं इश्क के ज़ोश में
कभी नहीं रहा दिल ये होश में।
कभी नहीं रहा दिल ये होश में।
बेचैन सी रही तमाम हसरतें उम्र भर
सुकूँ ना मिला दिल-ए-खानाबदोश में।
सुकूँ ना मिला दिल-ए-खानाबदोश में।
तराने आशिकी के फिजाँ में घुल रहे
सज ना सके तेरे लब-ए-ख़ामोश में।
सज ना सके तेरे लब-ए-ख़ामोश में।
मुंतज़िर-ए-दीद को हो रहा 'व्याकुल '
आरज़ू यही दम टूटे तेरे आग़ोश में।
#मुंबई #१७ दिसंबर २०१६
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