यादें तुम्हारी
आ बसीं कभी जो फ़ुर्सत में
कोई नज़राना सा
मिला हाल-ए-ग़ुर्बत में।
तेरे आने के
पहले दिल बंजारे सा फिरा
क़ैद ख़ुद में हो
गया फिर तेरी उल्फ़त में।
महरूम रहा इस
जहाँ की शानो-शौकत से
इक उम्र फिर जी
लिया दिल तेरी क़ुर्बत में।
तेरे आग़ोश में
मयस्सर जितने भी लम्हे हुए
जिए जाने को
बहुत थे अहद-ए-फ़ुर्क़त में।
इस संगदिल जहाँ
में ग़मज़दा रहा 'व्याकुल'
मसीहा तुम ना बन
सके दम-ए-रूख़्सत में।
#मुंबई #२४ दिसंबर २०१६
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