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Poem (52) Geet (1)

Sunday, 26 March 2017

नज़राना

मत नाप कद से मेरे तू इस दिल का इलाका
देख गौर से मैं हूँ छोटा पैकेट बड़ा धमाका।

मोहब्बत में सलीम की क्यों तू ऐश्वर्या बनती है
सिनेमा में आज भी फिल्म बिग बी की चलती है।

देख कर तुझे मेरी तबियत ऐसे मचलती है
हाथ में से कोई आईसक्रीम ज्यूँ पिघलती है।

सलीम को अपनाने का आइडिया तेरा फिजूल है
गर्मी जब सताए है तो काम आए डरमी कूल है।

कर ले नज़राना कुबूल अब तो मेरे प्यार का
नाम तेरे कर दूँगा मैं वाउचर बिग बाजार का।

बंधन ३

माँ तेरा प्यार
ही मेरी
शक्ति है
किंतु ये धरा
मेरे अस्तित्व की
अभिव्यक्ति है...
ऋण चुकाने हेतू
यदि धरा पुकारेगी
तेरे आशीर्वाद से
सिंचित होकर
मैं आहूति
बन जाऊँगा
माँ का लाल
कहलाऊँगा।

बंधन २

क्यों रिश्ते
दिलों के
अंजान हुए
हुआ जब सामना
पशेमान हुए
बचपन में
जो सब
हम बाँट
लिया करते थे
बड़े होने पर
हमारे दरम्याँ
क्यों...
ज़मीं-आसमान हुए।

बंधन १

मोह जो
तुम्हे मुझसे है
धधकता है
अंगारे सा
भीतर तुम्हारे
और मुझमें
चिंगारी सा
डरता हूँ
कहीं सुलगता
ना रहे मुझमें
आजीवन
और...
छोड़ दे मुझे
भस्म होने को
तुम्हे मुक्त
करने को।

ख़्वाब - २

सोच मुक्त
हुई नहीं
जंजीरें
टूटी नहीं
परंपराएं
झूठी नहीं
मन की बात
कही नहीं
अपनों की
सुनी नहीं
नई कहानी
बुनी नहीं
राह हट के
चुनी नहीं
दिखता कोई
गुनी नहीं
क्यों ज़िंदगी
सुलझी नहीं।

ख़्वाब

तुम्हे चाहना
और पाना भी
तुम्हे देखते हुए
सँवरना भी
तुम्हारे संग
पलों का
गुजरना भी
तुम्हारी उपेक्षा को
भूलना भी
तुमसे जुड़कर
टूटना भी
तुम्हे पाकर
बिखरना भी
तुम्हे तुमसे
चुराना भी
तुम्हारे संग
जीना और
मर जाना भी।

इश़्क

तेरी यादों में इस कदर बिखरा
चाह कर भी सँवर नहीं पाता।

कर ना सका तिजारत इश़्क की
ज़बान देकर मुकर नहीं पाता।

दिल परिंदे सा कब तलक उड़े
क्यों ज़मीं पे शजर नहीं पाता।

क़ाफिर बन गया तिरे इश्क में
अब दुआ में असर नहीं पाता।

जुदाई में तिरी बेख़ुद हुआ
अब ख़ुशी की ख़बर नहीं पाता।

दिल मिरा खिला 'आज सिरहाने'
मुरझाता गर दर नहीं पाता।