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Poem (52) Geet (1)

Sunday, 22 October 2017

बादल

विशाल नभ में
विचरता बादल
ढूंढे है छोर...
जब ना मिले
तो 'व्याकुल' होकर
तके धरा की ओर...
कहीं पाता
बारिश की बाट
जोहता किसान...
तो कहीं
बाढ़ की विभिषिका
से जूझता इंसान...

कहीं दिखती वसुंधरा
हरी-भरी...
कहीं मीलों फैला
रेगिस्तान...
कहीं दिखते बच्चे
तैरते तरणताल में...
कहीं रोते-बिलखते
भूख से बेहाल से...
कहीं एक प्रेमी
विरह में आँसू बहाता...
कहीं किसी युगल को
एक-दूजे के प्यार में
सराबोर पाता...

भ्रम में बादल
स्वयं को पाता...
धरा के निमंत्रण को
ठुकरा नहीं पाता...
विचार मग्न हो
धरती पे आता...
आस बनकर
बरस जाता...
ज़मीन को
आसमां से मिलाता...

#व्याकुल

तुम चुप थी उस दिन

अज़नबी था 
जब तुमसे पहली बार मिला था...
बातों-मुलाकातों का दौर
फिर तुम संग बढ़ चला था...
तुमसे मिले बगैर
मेरा ना कोई दिन ढला था...
हाथ तुम्हारा थामे 
मैं हर एक कदम चला था...
तुम्हें संजोकर आँखों में
मेरा तो हर ख़्वाब पला था...
साथ हमेशा दोगी
यही तुमने हर दिन कहा था...
तुम चुप थी उस दिन
पर वो आँखों में क्या था...
बहने को था आतुर
पर अधरों में अटका था...
ख़त थमा कर हाथों में
मुझसे जैसे वक्त मुड़ा था...
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का आँचल
मुझ पर आखिरी बार उड़ा था...
टूटा था खुद में मैं पूरा
उम्र भर फिर ना जुड़ा था...

#व्याकुल

ज़िन्दगी

क्या प्राणवायु आपूर्ति
हुई थी बाधित
या यूँ ही शिशुओं
का दम घुटा था...
क्या रेलमार्ग
हो गए हैं शापित
या यात्रियों का
दिन बुरा था...
क्या लुप्त होती
जा रही संवेदना
या यूँ ही युवतियों का
स्त्रीत्व छिना था...
क्या सुरक्षा देश की
है सर्वोपरि
या यूँ ही सीमा पर शव
सैनिक का गिरा था...
'ज़िंदगी'...
तुम चुप थी उस दिन
पर वो आँखों में क्या था...
हारी थीं तुम स्वयं से
या फिर
मानवता से
विश्वास उठा था...।

#व्याकुल

Saturday, 21 October 2017

तुम से तुम तक

'तुम'...
मैंने जब
पहली बार कहा था
तुम्हें कितना
सुखद लगा था...
पता नहीं क्यों
'आप' बेगाना
'तुम' अपना सा
लगता है...
तुम्हें भी तो
यही लगा था...
चंद मुलाकातों में
'तुम' मेरी हो गई थी
और मैं तुम्हारा...
तुमसे जुड़ी
हर बात मुझे
तब भी भाती थी
और आज भी...
तुम्हारी बातें
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारी मुस्कान...
जानती हो क्यों
क्योंकि ये मुझे
अकेला नहीं
होने देतीं...
तब भी
साथ होती हैं
जब 'तुम'
संग नहीं होती...
सच कहूँ
'तुम' ने मुझे
सब कुछ दिया
मैं रिक्त था
मुझे 'पूर्ण' किया...
मैं अधूरा था
संपूर्ण किया...
मेरा यह
जीवन है
'तुम' से
'तुम' तक...

#व्याकुल

दीपावली

आओ मिल के लगाएँ पंक्तियाँ
हम उन दियों की, 
स्नेह-आशीष हों समेटे 
जो अपने प्रियों की, 
नहीं दरकार है हमें 
राजनैतिक जुमलुओं की, 
वैमनस्य के अंधेरे को करे दूर
लहर चले ऐसे जुगनुओं की, 
भूखे पेट में देने को निवाले 
बहे ना धार आंसुओं की, 
भेंट गरीबी के ना चढ़े 
नन्हीं आरजूओं की, 
प्रगति पथ पर बढ़ने में ना 
हो कमी रोशनियों की, 
तभी होगी संपन्न सबकी 
दीपावली खुशियों की |

#व्याकुल