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Poem (52) Geet (1)

Saturday, 23 July 2016

गणतंत्र दिवस २०१६

अपना परिचय बाद में दूंगा पहले कुछ बतलाता हूँ,
नई बात कहने से पहले पुरानी को दोहराता हूँ,
१९४७ में ब्रिटिश दासता से देश की धरती मुक्त हुई थी,
बीत गए ६६ बरस जब गणराज्य की स्थापना हुई थी।

चीन-पाक के पाँच युद्धों ने देश की अखंडता को आजमाया है,
लेकिन दुश्मन ने हर युद्ध में राष्ट्र को अटल खड़ा पाया है,
प्रगति की राह थामे कितनी आगे  गए हैं सब,
कभी था लघु भारत १२५ करोड़ हो गए हैं अब।

साल के दो दिन बड़ी शान से तिरंगा सब फहराते हैं,
अगले दिन सांकेतिक तिरंगे को धरा पर गिरा पाते हैं,
सहनशीलता का देकर वास्ता देश को असहिष्णु ठहराते हैं,
कथनी-करनी के इस अंतर को बुद्धिजीवी बखूबी निभाते हैं।

लोगों के द्वारा, लोगों के लिए, लोगों का तंत्र सभी रटा करते हैं,
चुनावी लूटेरों द्वारा लूटे जाने को फिर भी दोहराया करते हैं,
देश ने क्या दिया क्या नहीं बस यही सोचा करते हैं,
क्या कर जाएं देश के लिए यह विचार नहीं करते हैं।

सोच रहे हैं सभी की कौन है ये जो सब कुछ है जानता,
मैं वही संविधान हूँ जिसका जन्मदिन आज है पूरा देश मनाता/

हर इंसान का इक-दूजे से मानवता का नाता हो,
धर्मांधता का राष्ट्रीयता से ना कोई भी वास्ता हो,
आगे बढ़ने की चाह लिए सभी प्रगतिशील हों,
लेकिन विवेक का दामन थामे पहले संवेदनशील हों/

सदगुणों की फसल बो कर संस्कारों से उसको सींचें,
सत्कर्मों की खाद मिली तो सद्भाव के फल लगेंगे मीठे,
चरित्र का ऐसा निर्माण हो कि देश का कल्याण हो,
निजी हितों की पूर्ति से बढ़कर राष्ट्र पर न्योछावर प्राण हों।

शरीर के लिए आत्मा है जैसे राष्ट्र के लिए संविधान है,
समूचे विश्व के नक्शे पर संविधान ही राष्ट्र की पहचान है,
मैं से पहले हम हों, हम से पहले समाज हो,
समाज से पहले संविधान और संविधान से पहले राष्ट्र हो।
स्वायत्ता-संप्रभुता-धर्मनिरपेक्षता सशक्त लोकतंत्र के स्तंभ हैं,
इनको संजोय रखने को सभी देशवासियों से आव्हान करबद्ध है।

(६६वें गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में समस्त भारतवासियों को स्व-रचित पंक्तियों के साथ कुछ विचार-मंथन के लिए, २६ जनवरी २०१६)
© 26th January 2016 Sushil Kumar Sharma

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इश्क

हर खुशी से दिल करे इन्कार सा
क्या ग़मों से कर बैठा इक़रार सा।

इश्क किया था हमने बेपनाह तुमसे
काश कर देते तुम कभी इजहार सा।

हम तो बावफा रहे उम्र भर लेकिन
उनके लिए प्यार था कारोबार सा।

दोस्ती से उठ गया भरोसा इस कदर
दुश्मनों पर होने लगा है ऐतबार सा।

चला गया जो कभी ना लौटने को
आँखें आज भी करे हैं इंतज़ार सा।

खोया पाया इतना कुछ इक उम्र में
मरना भी लगने लगा है दुश्वार सा।

- 'व्याकुल'
२२ जुलाई २०१६, मुंबई

Thursday, 21 July 2016

पूरे...या...अधूरे

पूरे...या...अधूरे

तीस बरस बाद फूल खिले थे,
सबके चेहरे चमक उठे थे,
उमंग के संग जोश जगे थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।

हाथ के बाद दिल भी मिले थे,
यादों-बातों के दौर चले थे,
गीत-संगीत के रतजगे थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।

यारी-दोस्ती उबाऊ हो चले थे,
खूबियों में खामियां दिखने लगे थे,
करीबी दिल दूर हो चले थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।

जीने को जीवन एक बार मिले है,
कहने को दिल की क्यों होंठ सिले हैं,
क्यों करते दूर हमें ये शिकवे-गिले हैं,
क्या हो गए हैं हम पूरे या अब भी अधूरे हैं।

(कहते हैं जिंदगी लंबी ना सही पर बड़ी होनी चाहिए...एक विचार अपने केवीजी मित्रों के समक्ष चिंतन और मनन हेतु...स्व-रचित, द्वारा सुशील शर्मा 'व्याकुल', मुंबई, ०४ जुलाई २०१६)

© 4th July 2016 Sushil Kumar Sharma
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मिट्टी की खुशबू

मिट्टी की सोंधी खुशबू ने एक उमंग जगा दी है,
ईश्वर ने बारिश के संग सपनों को हवा दी है।

तपती धरती की व्यथा की बादलों ने अब सुध ली है,
जैसे रोते शीशु की भूख माँ की आहट से बुझ ली है।

बच्चों ने भीगने की तैयारी देखो जम कर की है,
किसान ने फुहारों की आगवानी में आँखें नम की है।

गरजते बादलों की दहाड़ पर्वत पर रूकी सी है,
मनवाने को बात जैसे कोई आँख झुकी सी है।

सतरंगी इंद्रधनुष की छटा बिखरी नभ पर भी है,
धरा को हरा रंगने का दायित्व हम सब पर भी है।

गिरती बूंदों के संग में भर आया आज यह जी है,
मैंने भी इन बूंदों में भीग कर आज एक सदी जी है।

(वर्षा ऋतु के आगमन पर शब्दों से भीगने-भीगाने हेतु एक प्रयास...स्व-रचित, द्वारा सुशील शर्मा 'व्याकुल', मुंबई, ०१ जुलाई २०१६)

© 1st July 2016 Sushil Kumar Sharma
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साथी

अठ्ठारह बरस पहले प्यार की दो कलियाँ थी खिलीं
सबके चहेते हमारे रजत को प्यारी भावना थी मिली
उमंग भरे प्रफुल्लित मन से कह उठा था ये रजत
आज से पहले आज से ज्यादा खुशी आज तक नहीं मिली।

थे कभी जो अजनबी आज बन गए थे हमजोली
छेड़ने-सताने रूठने-मनाने की शुरु हो गई आँख-मिचोली
प्यार के मीठे अहसास के संग सपने होने लगे सुहाने
साया साथी का साथ सदा ही पाया जब भी सपनों से आँखें खोलीं।

प्यार भरा यह छोटा सा सफ़र कारवाँ बनता गया
रंग और खुशी भरा फूल प्यारी बगिया में जुड़ता गया
नंदिनी के रूप में सलोनी बिटिया की सौग़ात मिली
जुड़कर खुश ने परिवार में झोली खुशीयों से भरी।

रहो सदा खुश तुम दोनों दुःख से ना हो सामना
ईश्वर सदैव करें पूरी तुम्हारी हर मनो कामना
प्यार-विश्वास एक दूजे का ना खोना सिर्फ पाना
रहे समृद्ध-संपन्न-सकुशल रजत की हर भावना।

© 24th November 2015 Sushil Kumar Sharma
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