पूरे...या...अधूरे
तीस बरस बाद फूल खिले थे,
सबके चेहरे चमक उठे थे,
उमंग के संग जोश जगे थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।
सबके चेहरे चमक उठे थे,
उमंग के संग जोश जगे थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।
हाथ के बाद दिल भी मिले थे,
यादों-बातों के दौर चले थे,
गीत-संगीत के रतजगे थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।
यादों-बातों के दौर चले थे,
गीत-संगीत के रतजगे थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।
यारी-दोस्ती उबाऊ हो चले थे,
खूबियों में खामियां दिखने लगे थे,
करीबी दिल दूर हो चले थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।
खूबियों में खामियां दिखने लगे थे,
करीबी दिल दूर हो चले थे,
क्या थे हम अधूरे या पूरे हो गए थे।
जीने को जीवन एक बार मिले है,
कहने को दिल की क्यों होंठ सिले हैं,
क्यों करते दूर हमें ये शिकवे-गिले हैं,
क्या हो गए हैं हम पूरे या अब भी अधूरे हैं।
कहने को दिल की क्यों होंठ सिले हैं,
क्यों करते दूर हमें ये शिकवे-गिले हैं,
क्या हो गए हैं हम पूरे या अब भी अधूरे हैं।
(कहते हैं जिंदगी लंबी ना सही पर बड़ी होनी चाहिए...एक विचार अपने केवीजी मित्रों के समक्ष चिंतन और मनन हेतु...स्व-रचित, द्वारा सुशील शर्मा 'व्याकुल', मुंबई, ०४ जुलाई २०१६)
© 4th July 2016 Sushil Kumar Sharma
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Lovely sentiment! We have always been complete on our own.
ReplyDeleteFriends & family complement this completeness.
Absolutely Gita...wanted to convey what was going on within myself...
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