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Thursday, 21 July 2016

मिट्टी की खुशबू

मिट्टी की सोंधी खुशबू ने एक उमंग जगा दी है,
ईश्वर ने बारिश के संग सपनों को हवा दी है।

तपती धरती की व्यथा की बादलों ने अब सुध ली है,
जैसे रोते शीशु की भूख माँ की आहट से बुझ ली है।

बच्चों ने भीगने की तैयारी देखो जम कर की है,
किसान ने फुहारों की आगवानी में आँखें नम की है।

गरजते बादलों की दहाड़ पर्वत पर रूकी सी है,
मनवाने को बात जैसे कोई आँख झुकी सी है।

सतरंगी इंद्रधनुष की छटा बिखरी नभ पर भी है,
धरा को हरा रंगने का दायित्व हम सब पर भी है।

गिरती बूंदों के संग में भर आया आज यह जी है,
मैंने भी इन बूंदों में भीग कर आज एक सदी जी है।

(वर्षा ऋतु के आगमन पर शब्दों से भीगने-भीगाने हेतु एक प्रयास...स्व-रचित, द्वारा सुशील शर्मा 'व्याकुल', मुंबई, ०१ जुलाई २०१६)

© 1st July 2016 Sushil Kumar Sharma
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