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Sunday, 26 March 2017

'तुम...'

झुरमुट थे सपनों के
भँवर में नयनों के
यदा-कदा डूबता रहा
कुछ ढूंढता रहा
सुखद सी वो अनुभूति
रही सदा मुझे छूती
सिहरन एक उठाती सी
रोम-रोम महकाती सी
कदा्चित यही प्रेम है
जिससे मैं उबरता नहीं
होश भी आता नहीं...!











मूरत में गढ़ता रहा
स्पर्श तुम्हे करता रहा
चित्र में थी ढल गई
दे ना पाया रंगत नई
अक्षरों सी तुम धनी
कविता ना मुझसे बनी
उद्गार पा गए संजीवनी
मशाल बन गई लेखनी
निश्चित ही यह प्रेम है
जो मुझे सुलगाता नहीं
भस्म भी करता नहीं...!!!

#मुंबई #१० दिसंबर २०१६
#
व्याकुल











रही साथ जैसे साया
जिसे कभी ना छू पाया
उड़ती रही बनके पतंग
रिश्ता नहीं जैसे डोर संग
प्रतीत होती एक मरीचिका
बढ़ती रही मेरी जिजीविषा
उफनते सागर की लहर
मैं किनारे का एक प्रहर
क्या नहीं यह प्रेम है
जो मुझे डुबाता नहीं
जीने भी देता नहीं...!!


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