हर खुशी से दिल करे इन्कार सा
क्या ग़मों से कर बैठा इक़रार सा।
क्या ग़मों से कर बैठा इक़रार सा।
इश्क किया था हमने बेपनाह तुमसे
काश कर देते तुम कभी इजहार सा।
काश कर देते तुम कभी इजहार सा।
हम तो बावफा रहे उम्र भर लेकिन
उनके लिए प्यार था कारोबार सा।
उनके लिए प्यार था कारोबार सा।
दोस्ती से उठ गया भरोसा इस कदर
दुश्मनों पर होने लगा है ऐतबार सा।
दुश्मनों पर होने लगा है ऐतबार सा।
चला गया जो कभी ना लौटने को
आँखें आज भी करे हैं इंतज़ार सा।
आँखें आज भी करे हैं इंतज़ार सा।
खोया पाया इतना कुछ इक उम्र में
मरना भी लगने लगा है दुश्वार सा।
मरना भी लगने लगा है दुश्वार सा।
- 'व्याकुल'
२२ जुलाई २०१६, मुंबई
२२ जुलाई २०१६, मुंबई
No one can describe ones unrequited love better than you. Beautiful sentiment!
ReplyDeleteThanks Gita....
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