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Saturday, 7 May 2016

उड़ान

जो छू ले आसमां को वो उड़ान अभी बाकी है
जिंदगी के कई अभी इम्तिहान बाकी हैं।

छेड़ दे दिलों के तार वो साज़ बजना बाकी है
मिटा दे दिलों के फासले वो सफर अभी बाकी है।

सुलझा दे हर एक डोर वो गाँठ खुलना बाकी है
बना दे कली को फूल वो भँवरा आना बाकी है।

रोते बच्चे को सुला दे वो लोरी सुनाना बाकी है
भर दे जो पेट हर बच्चे का वो रोटी सिकना बाकी है।

कर दे दूर हर अंधेरे को वो सूरज उगना बाकी है
बुझा दे हर शमां को वो परवाना आना बाकी है।

जो ख्वाब देखता हूँ रात-दिन उसका मुकम्मल होना बाकी है
लगता है जैसे खुद से खुद की पहचान होना बाकी है।

(कुछ सूझा, सो लिख दिया...३१ दिसंबर २०१४)

© 31st December 2014 Sushil Kumar Sharma
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