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Wednesday, 4 May 2016

दिपावली २०१५

रामलीला से शुरु होता था पटाखों से अपना याराना
उत्सव होता था १०वें दिन पर अहंकारी रावण को मार गिराना
पैसे जोड़कर लाना पिस्तौल, रॉल-टिकली का जुगाड़ करना
चकरी, अनार, हंटर, फूलझड़ी चलाकर दिपावली की राह तकते जाना।

हुए बड़े तो रामलीला-रावण दहन में कम उत्साह होने लगा
दोस्तों से मिलकर, टोली बनाकर घूमना-फिरना रास आने लगा
दिपावली की रात रॉकेट, बम चलाना ज्यादा रोमांचित करने लगा
रात गहराते ही दोस्तों के घर पर ताश का जमवाड़ा लगने लगा।

हँसते-खेलते, देखते ही देखते हम सयाने हो गए
माता-पिता की खुशी की खातिर नए साथी के हमसफर हो गए
फीकी चमक वाली दिपावली में नए रंग अब भरने लगे
पाकर साथ हमराही का दिओं को रोशन करने लगे।

गहरे प्यार, बढ़ते परिवार के संग खुशियाँ भी दुगुनी हुईं
दिपावली पर कपड़े-पटाखे की बच्चों की मांगे बढ़ती गईं
टिकली, पिस्तौल, चकरी, फूलझड़ी से फिर एक बार पहचान हुई
बच्चों के संग दिपावली पर अपने बचपन की यादें ताज़ा हुईं।

कहते हैं दिपावली का अर्थ है लगाना दीपों की पंक्तियाँ
दीया प्रतीक है दूर करने को समाज में फैली विसंगतियाँ
दिया आस का, दिया प्रयास का, दिया साहस का, दिया विश्वास का
दिया अपनत्व का, दिया प्रेम का मिटा दे जो सारी कुरीतियाँ।

अमावस के अंधकार से मुक्ति का प्रतिक है दिपावली
ह्रदय के भीतर व्याप्त तिमिर को मिटा सकें तो है दिपावली
तेरा-मेरा, लेना-देना, खोना-पाना के बंधन से छूटकर
सृष्टि द्वारा निर्मित हर रचना को अपनाना है दिपावली।

# ११ नवंबर २०१५
# व्याकुल

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