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Wednesday, 4 May 2016

एक बंधन सच्चा सा

रिश्ता ये देखो बचपन का
कितना पावन अपना सा
साक्षी साथ बीते पलों का
एक बंधन सच्चा सा।

जिसे मिला वो खुशनसीब
जिसे ना मिला वो गरीब सा
रिश्तों की झूठी भीड़ में
एक बंधन सच्चा सा।

धागा डोर का कच्चा सा
रिश्ता मगर पक्का सा
खोकर सब कुछ पा सको गर
एक बंधन सच्चा सा।

समय की धूल से ढंकता सा
दूरियों की तपिश में तपता सा
बिन कहे सब कुछ कहता सा
एक बंधन सच्चा सा।

(रक्षा बंधन के शुभ अवसर स्व-रचित, २९ अगस्त २०१५)

© 29th August 2015 Sushil Kumar Sharma
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