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Sunday, 26 March 2017

नेता से अभिनेता

मेरा एक मित्र है
नाम उसका विचित्र है
आजकल अभिनेता है
बीते समय का नेता है...

आप कहेंगे 
कुछ भी बोलता है
ऐसा भी कभी होता है
कल जो होता था अभिनेता
आज का नेता होता है
फिजूल हमें बहलाता है
उल्टी गंगा बहाता है...

बात दर असल ऐसी है
ये जो डेमोक्रेसी है
हुई इसकी ऐसी-तैसी है
जैसी चाहो वैसी है
अभिनेता, नेता बनते आए
तब आप नहीं झुंझलाए
नेता अगर अभिनेता बना है
आपका माथा क्यों तना है...

खूबियों की वह खान है
चरित्र उसकी पहचान है
उसी के बल पर जीतता आया
चुनाव का हर घमासान है
यह जो हिंदुस्तान है
यहाँ सबकुछ आसान है
नागरिक सदा परेशान है
नेता खोले दुकान है
माल उसी का है बिकता
जिसका चरित्र 'महान' है...

#वयाकुल #मुंबई
#
१५ अक्टूबर २०१६
नेतागिरी एक व्यवसाय है
समेटे उसकी आय है
मेरी आपकी क्या राय है
वोटर समझ नहीं पाए है
नेता कुशल अभिनय से
अलग-अलग स्वांगों से
किरदारों में ढलते आए
जनता को छलते आए...

मतलब अभिनय करने से है
अपनी जेबें भरने से है
नेता का जलवा जनता के बीच
अभिनेता दिखे पर्दे के बीच
नेता लुभाए आश्वासन से
अभिनेता मंद मुस्कान से
जब इतनी समानता है
अभिनेता बनने में क्या जाता है
अब तक रहे हैं चरित्र की खाते
'
चरित्र' अभिनेता ही हैं बन जाते...

मेरा एक ही प्रश्न है
जो विचार मग्न है
नेता हो या अभिनेता
देश को क्या हैं वे देते
धर कर नित नए रूप
निज स्वार्थ पूरे कर लेते
दुःख होता जब सीमा पर
सैनिक छाती पे गोली लेते
ऐसे भावुक पल में भी
दोनों भाषण कर लेते
देश का यह दुर्भाग्य है
नेता, अभिनेता अविभाज्य है...


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