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Sunday, 26 March 2017

'वो सुबह...'

माँ जब प्यार से
बैठ 'सिरहाने'
हाथ फिराया करती थी
आकर खिड़की पे जब भी
गौरय्या चहचहाया करती थी
चीर के वातायन को जब
रौशनी आ जाया करती थी
कितनी सहज उस पल मेरी
सुबह हो जाया करती थी...

गर्मियों की रात में
बिजली का चले जाना
घर की छत का फिर
बिछौना बन जाना
एक दूजे से बतियाते हुए
बस नींद के हो जाना
चढ़ते सूरज को चिढ़ाते हुए
चादर को ताने रहना
कितना दुश्वार होता था
सुबह का यूँ आ जाना...

दोस्तों के संग सैर-सपाटे को
रोज़ ही जाया करते थे
बात क्रिकेट खेलने की हो तो
जल्दी उठ जाया करते थे
परीक्षा वाली रातों को
पढ़ते हुए बिताया करते थे
हाँ जवानी में कुछ इस तरह
सुबह को बुलाया करते थे...

#व्याकुल #मुम्बई
#२० अक्टूबर २०१६
देर हो जाए उठने में तो
आज ट्रेन छूट जाया करती है
घरवालों की जरूरतें अब
सदा उंगलियों पर रहती हैं
कैलंडर पे बढ़ती तारीख से
अब ज़ेब की राशि घटती है
रात को बिस्तर मिलता तो है
पर नींद कोसों दूर रहती है...

जैसे-तैसे उठ जाता हूँ
पर उमंग नहीं जगती है
कंक्रीट के इस जंगल में
मिट्टी की खुशबू बिसरती है
शहर में आके बस तो गया
यादें गाँव की ही रहती हैं
पल-पल की साँसें भी यहाँ
अब घड़ी देख के चलती हैं...

सुबह,दोपहर,शाम,रात
रोज़ ही ढला करते हैं
जो पल बीत गए सुनहरे
वही अब खला करते हैं
लौट जाने को घर की छत पे
दिल की ख्वाहिश कहती है
ज़िंदगी की इस शाम में अब
बचपन की 'वो सुबह' ढलती है...


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