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Sunday, 26 March 2017

अख़बार या व्यापार

कल मिला एक पुराना यार
पूछने लगा कुशल समाचार
मैं बोला जीना हुआ दुश्वार
क्या नहीं पढ़ते तुम अख़बार
वो बोला बात ना करो बेकार
जीवन चल रहा शानदार।

साला मेरा थानेदार
चौकी उसकी बीच बाज़ार
मचा है उसका हाहाकार
थर्राएं हैं सब दुकानदार
रग-रग में उसकी भ्रष्टाचार
धन्य हूँ पाकर ऐसा रिश्तेदार।

क्यों नहीं हो तुम शर्मसार
मानवता पर करो हो वार
जिसे मान रहे असरदार
दिखता नहीं उसका अत्याचार
कर डालो उसका तिरस्कार
नैया हो जाएगी पार।

भाई ये है उसका रोज़गार
भ्रष्ट हो तो मिलें उपहार
नाम बन जाता है इश्तहार
बरसने लगते हैं पुरस्कार
जितना करो तुम दुराचार
नाम छपे है बारंबार।

सारी बात का एक ही सार
जब भी पढ़ो तुम अख़बार
दिखे नरसंहार व बलात्कार
या किसी दुष्ट का व्यभिचार
दूर से करो उसे नमस्कार
मत चाहो कोई चमत्कार
यह महज है एक व्यापार
जिस से बिके है हर अख़बार।


#व्याकुल #मुंबई
#
०८ अक्टूबर २०१६

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