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Poem (52) Geet (1)

Sunday, 26 March 2017

अंत नहीं चाहता...

सोच रहा हूँ
कैसे प्रारंभ करूँ
कहाँ से और क्यों...
क्यों इसलिए कि
प्रारंभ वही होगा
जिसका अंत हो..

जो अनंत है
उसका कैसा प्रारंभ
मैं इस अनंत का
अंत नहीं चाहता...

मैं नहीं चाहता 
कि..
हमारी पहली भेंट
का कोई अंत हो
वो भेंट..
जिसमें तुम
मुझे भा गई थी
जिसमें मैं
खो गया था..
तुम्हारी आँखों के
भँवर में
मैं उस भँवर का
अंत नहीं चाहता...

मुझे याद आता है
वो पल..
जब मैंने
अपने प्रेम की
अनुभूति
तुम्हे सौंपी थी..
और तुम
लजाई थी
मैं हुआ था
तुम्हारा..
और तुम
मुस्कुराई थी
मैं उस पल का
अंत नहीं चाहता...

मुझे नहीं भूलता
वो अपनापन
जो मिला तुमसे..
वो स्पर्श
जो दिया तुमने
वो प्यार..
जो उड़ेला तुमने
वो सान्निध्य
जो गढ़ा तुमने
मैं इन यादों का
अंत नहीं चाहता...

मुझे भाते हैं
वो दिन
जो हमने
साथ हैं काटे...
वो रात
जो साथ गुजारी..
वो बारिश
जिसमें भीगे थे
वो सर्दियाँ..
जिसमें सिमटे थे
मैं उन मौसमों का
अंत नहीं चाहता...

मुझे लुभाता है
वो रस्ता
जिसपे चले साथ..
वो संघर्ष
जो झेला साथ
सुख-दुःख का
हर मेला..
जिसमें हम
रहे साथ
वो साथ..
जो है
इस जन्म का
किंतु लगे है
सात जन्मों का
मैं इस साथ का
अंत नहीं चाहता...

#व्याकुल

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