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Sunday, 26 March 2017

नए झरोखे


एक अंतर्द्वंद से
मैं अक्सर 
जूझता हूँ
एक सवाल 
मैं दिल से
रोज पूछता हूँ
क्यों मनुष्य
पहेली की भाँति
व्यथित किया 
करता है
नित नए 
स्वांग रचकर
मुझे चकित 
करता है !

दिखे जैसा
वैसा होता नहीं
मुखौटे बहुत
एक चेहरा नहीं
किया विश्वास जहाँ
है छलता वहीं
संवेदनाओं को
कुचलता वहीं !!

टीवी, अखबार
पत्रिका में
एक से किस्से 
दिखते हैं
निज स्वार्थ
के लिए 
एक दूजे को 
डसते हैं
अखंडता देश की
ताक पे रख कर
सुरक्षा पे राजनीति 
करते हैं
देश का 
कर्णधार होने का
ढोंग रचा 
करते हैं !!!  

#व्याकुल #मुंबई
#२० अक्टूबर २०१६
छोटा था जब
बैठ झरोखे पे
यही सोचा किया
क्षितिज वही है
जहाँ धरा से 
नभ ने 
मिलन किया
आज जाना हूँ
कि ये मिलन 
कभी नहीं 
होना है
झरोखे से 
सीखा यही
दृष्य ओझल
नहीं होना है !!!!

ना जाने क्यों 
ये झरोखा
मानव समक्ष
विवश है
मानवता 
जगाने हेतू
यह भी तो
बेबस है
क्यों ना हम 
सीख 'झरोखे' से
परिदृश्य को
व्यापक बनाएं
हर हृदय में
लौ जगाकर
दृष्टिकोण को
सबल बनाएं !!!!!!








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