पूछ बैठा था एक बात
कहानी से
किस्सा
क्या मैं भी हिस्सा हूँ तुम्हारा
या रिश्ता कोई बेमानी सा।
क्या मैं भी हिस्सा हूँ तुम्हारा
या रिश्ता कोई बेमानी सा।
बोली कहानी
किस्सों का क्या है
वो तो होते रहते हैं,
लेकिन मुझसे
अभिव्यक्ति के
मायने जिंदा रहते हैं।
किस्सों का क्या है
वो तो होते रहते हैं,
लेकिन मुझसे
अभिव्यक्ति के
मायने जिंदा रहते हैं।
किस्सा हुआ
तो क्या हुआ
मेरी भी पहचान है,
कहते हैं
किस्से-कहानियाँ तो
लेखन की आन-बान हैं।
तो क्या हुआ
मेरी भी पहचान है,
कहते हैं
किस्से-कहानियाँ तो
लेखन की आन-बान हैं।
कहानी हूँ मैं
है मेरी उम्र बड़ी,
कितनों ने लिखा
मुझे अभिमान से,
कितनों के बाँचन
की शान बन पड़ी।
है मेरी उम्र बड़ी,
कितनों ने लिखा
मुझे अभिमान से,
कितनों के बाँचन
की शान बन पड़ी।
किस्सा तो हूँ
पर काल्पनिक नहीं,
तुम्हारी तरह
मैं दार्शनिक नहीं।
पर काल्पनिक नहीं,
तुम्हारी तरह
मैं दार्शनिक नहीं।
मैं कहानी हूँ
बड़ी भी, छोटी भी
खरी भी, खोटी भी
हँसती भी, रोती भी
मिलती भी, खोती भी।
बड़ी भी, छोटी भी
खरी भी, खोटी भी
हँसती भी, रोती भी
मिलती भी, खोती भी।
हाँ मैं तो एक किस्सा हूँ
आज हूँ, कल नहीं हूँ
ज़मीन हूँ, आसमां नहीं हूँ
सफर हूँ, मंज़िल नहीं हूँ
ज़िंदा हूँ, अमर नहीं हूँ।
आज हूँ, कल नहीं हूँ
ज़मीन हूँ, आसमां नहीं हूँ
सफर हूँ, मंज़िल नहीं हूँ
ज़िंदा हूँ, अमर नहीं हूँ।
लेकिन मैं तुमसे ही हूँ
तुम हो, तो मैं हूँ
जहाँ तुम हो, वहाँ मैं हूँ
तुम नहीं, तो मैं भी नहीं
हाँ मैं एक किस्सा ही हूँ
मैं तुम्हारा हिस्सा ही हूँ।
तुम हो, तो मैं हूँ
जहाँ तुम हो, वहाँ मैं हूँ
तुम नहीं, तो मैं भी नहीं
हाँ मैं एक किस्सा ही हूँ
मैं तुम्हारा हिस्सा ही हूँ।
#स्वलेख #सुशील शर्मा 'व्याकुल'
#मुंबई #०४ सितंबर २०१६
#मुंबई #०४ सितंबर २०१६
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