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Sunday, 26 March 2017

रहनुमा

तेरे शहर की आग से उठता धुआँ नहीं
लोग क्यों ख़ामोश हैं जब बेज़ुबाँ नहीं

निकले घर से बनके जो सबके रहनुमा
सफ़र में उनके ही कदमों के निशाँ नहीं।

ढो रहे कांधों पे जो अपने जिस्म का बोझ
ज़मीं उन्हें मयस्सर हुई पर आसमाँ नहीं।

झूठी तक़रीरों से जो दिल बहलाते रहे
यक़ीं अब हो चला है कोई पासबाँ नहीं।

#मुंबई #०३ दिसंबर २०१६
#
व्याकुल

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