तेरे शहर की आग से उठता धुआँ नहीं
लोग क्यों ख़ामोश हैं जब बेज़ुबाँ नहीं
लोग क्यों ख़ामोश हैं जब बेज़ुबाँ नहीं
निकले घर से बनके जो सबके रहनुमा
सफ़र में उनके ही कदमों के निशाँ नहीं।
सफ़र में उनके ही कदमों के निशाँ नहीं।
ढो रहे कांधों पे जो अपने जिस्म का बोझ
ज़मीं उन्हें मयस्सर हुई पर आसमाँ नहीं।
ज़मीं उन्हें मयस्सर हुई पर आसमाँ नहीं।
झूठी तक़रीरों से जो दिल बहलाते रहे
यक़ीं अब हो चला है कोई पासबाँ नहीं।
यक़ीं अब हो चला है कोई पासबाँ नहीं।
#मुंबई #०३ दिसंबर २०१६
#व्याकुल
#व्याकुल
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