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Sunday, 26 March 2017

मेरा उत्सव

बेवफाई की सर्द हवा में
मुहब्बत के मोम में डूबा
तेरा हर एक ख़त जलाया
यूँ मैंने उत्सव मनाया...

दोस्ती की आड़ में जबसे
खुद को है छला सा पाया
हर दुश्मन को दोस्त बनाया
यूँ मैंने उत्सव मनाया...

जो मुझे समझे नहीं हैं
वक्त ना ज़ाया उन पे करके
खुद को खुश रहना सिखाया
यूँ मैंने उत्सव मनाया...

ना उम्मीद थपेड़ों से जूझती
नाकाम हसरतों की लहरों को
आस भरा किनारा दिखाया
यूँ मैंने उत्सव मनाया...

#मुंबई #२६ नवंबर २०१६
#
व्याकुल
हक़ीकत की पथरीली राहों में
लड़खड़ाते ख्वाबों को
गिर के फिर उठना सिखाया
यूँ मैंने उत्सव मनाया...

अपने-पराए के भ्रम से
खोने-पाने के फेर से
दिल को ऊपर उठना सिखाया
यूँ मैंने उत्सव मनाया...

छल-कपट की रणभूमि में
संवेदनाओं को निहत्था पाकर
कलम को अपना शस्त्र बनाया 
यूँ मैंने उत्सव मनाया...

ढलती 'साँझ' में घर लौटके
बैठ 'आज सिरहाने' माँ के
मैंने उनका पैर दबाया
यूँ मैंने 'उत्सव' मनाया...

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