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Sunday, 26 March 2017

खुशनसीब

पाकर तुमको खोया था
खोकर फिर से पाया है,
खोने का है मोल क्या
सार समझ में आया है।

जीवन मेरा रहा एकाकी
दोस्ती-यारी खूब जमा की,
मित्र-आलोचक-शुभचिंतक
सब कुछ तुम में पाया है।

चुनौतियों की राह बड़ी थी
तुम संग में डटी खड़ी थी,
मायूसी की कड़ी धूप में
रहा तुम्हारा साया है।

वक्त अभावों में भी बीता
तुम साथ थी जैसे सीता,
विषम परिस्थिती में तुमने
सदैव संयम दर्शाया है।

जिम्मेदारी हो अपनों की
या बच्चों की देख-रेख हो,
सबको प्यार से सींचने में
अपना सर्वस्व झुलसाया है।

विशाल हृदय की हो मलिका
सादगी भरा जीने का सलीका,
पीड़ा अपने भीतर रख के
चेहरा सदा मुस्काया है।

धन-दौलत की चाह नहीं है
राह चली वो जो सही है,
दक्ष ग्रहिणी का किरदार
तुमने बखूबी निभाया है।

अहम तुमसे है कोसों दूर
करूणा दिल मे है भरपूर,
जब भी कोई करीब है
उस पर प्यार लुटाया है।

कश्ती मैं किनारा तुम हो
धुन मैं हूँ इकतारा तुम हो,
मेरी चाहत के खजाने को
तुमने ही चुराया है।

मेरी तो पहचान तुम्ही से
आन-बान-शान तुम से,
दिल के हर इक कोने में
तुम्हारा ही अक्स छाया है।

खुद में पूर्ण कभी नहीं था
अपने को ही माना सही था,
करके सब कुछ दरकिनार
तुमने मुझे अपनाया है
मैंने खुद को खुशनसीब पाया है।

(मेरी हमसफर, मेरी जीवन संगीनी, मेरी अभिन्न मित्र को जन्मदिन पर एक छोटा सा उपहार)..

- स्वलेख, सुशील शर्मा 'व्याकुल'
०१ सितंबर २०१६, मबुंई

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