ये कैसी दुश्मनी कदमों ने मेरे संग है निभाई
ज़मीं तो है थमी सी आसमां ना दे दिखाई।
ज़मीं तो है थमी सी आसमां ना दे दिखाई।
दिन के उजाले ने किया है मेरे दिल में अंधेरा
अब तो चाँद ने है अपनी चाँदनी भी छिपाई।
अब तो चाँद ने है अपनी चाँदनी भी छिपाई।
सो रहा हूँ कब से अपनी ही मायूसी ओढ़ कर
मुद्दत से किसी ने हसरत की चादर ना बिछाई।
मुद्दत से किसी ने हसरत की चादर ना बिछाई।
गिरते रहे हैं शाख-ए-उम्मीद से मेरे ख्वाब टूट कर
आँसूओं की बारिश भी दिल-ए-बंजर पे ना रिझाई।
आँसूओं की बारिश भी दिल-ए-बंजर पे ना रिझाई।
अपनों से बिछुड़ कर हर पल एक सदी सा है बीता
आईने पर उभरती लकीरों ने बची साँसें हैं गिनाई।
आईने पर उभरती लकीरों ने बची साँसें हैं गिनाई।
होने को मुकम्मल कोई भी आरजू ही ना रही
यह रूह भी इस जिस्म से माँग रही है रिहाई।
यह रूह भी इस जिस्म से माँग रही है रिहाई।
(मेरी यह गज़ल हिंदुस्तान और पाकिस्तान में कैद उन सभी 'सरबजीत' के जज्बे को एक सलाम है जिन्हें सिर्फ इंतज़ार है रिहाई का...जेल से या जीने से, मालूम नहीं)
A very touching & moving composition!
ReplyDeleteThanks Gita for liking this gazal of mine too...
ReplyDeleteअच्छी ग़ज़ल है भाई , और का इंतेज़ार है 😀👍
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