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Saturday, 14 May 2016

कुदरत के तराने

समंदर की लहरों का किनारे पे आना,
झूमती हवाओं का पेड़ की डाली हिला जाना,
बरसात की बूंदों का गुलाब की पंखुड़़ियों में सिमट जाना,
जैसे की किसी महबूब का अपने यार का दीदार किए जाना।

कुदरत में हैं बिखरे प्यार के बेशुमार तराने,
कहीं फूल पे मंडराते भँवरे कहीं शमा पे मचलते परवाने,
जीवन गर संगीत है तो अपनी ही धुन चुनते जाएं,
दिल से करें सबसे बातें, दिल की ही सुनते जाएं।

(प्रकृति से मुखातिब होतीं कुछ पंक्तियाँ...)

© 4th May 2015 Sushil Kumar Sharma
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