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Saturday, 14 May 2016

तन्हाई

पूछते हैं वो कि दर्द क्यों होता है
काश जाना होता दिल तन्हा जब होता है।

दर्द और तन्हाई का रिश्ता समझ ना पाए हम
दर्द में खुद को तन्हा,तन्हाई में दर्द को अपना पाया।

तन्हाई के डर से वो भीड़ के हो जाया करते हैं
हम तो खुद को भीड़ में तन्हा पाया करते हैं।

तन्हाई में बहते आँसू की गमी किसे दिखाई देती है
हो बरसात में आँखें नम तो तन्हाई तन्हा रह जाती है।

तन्हा दिल ने कभी सोने ना दिया
दर्द-ऐ-दिल ने कभी रोने ना दिया
जिन्हें समझते रहे हमदर्द अपना
उनके दिए दर्द ने खुद से पराया होने ना दिया।

(तन्हाई में, तन्हाई पर लिखी कुछ पंक्तियाँ...)

© 16th February 2015 Sushil Kumar Sharma
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