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Saturday, 14 May 2016

एक लम्हा

तन्हा चलते-चलते कल एक लम्हे से मुलाकात हो गई,
तन्हाई भुलाने के लिए बातचीत की शुरुआत हो गई।

मैंने कहा थोड़ा ठहरो तो मेरा वक्त गुजर जाएगा,
वो बोला मैं जो ठहरा तो मंज़र ही बदल जाएगा।

मैं तो बस इक लम्हा हूँ रूकना मेरी फितरत में नहीं,
जीने के लिए मेरे पास इक पल के सिवा कुछ भी नहीं।

मैंने कहा जीने को हमें एक जिंदगी कम लगती है,
तुम बस इक लम्हा हो किस आस पे साँस चलती है।

वो बोला इक-इक लम्हे से ही तो जिंदगी बना करती है,
हर लम्हे को जीना सीखा तो जिंदगी हसीन लगती है।

(एक लम्हे से साक्षात्कार...)

© 7th May 2015 Sushil Kumar Sharma
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