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Wednesday, 4 May 2016

ग़ुलामी से आज़ादी

उस रात मेरे साथ एक बात अजब सी हो गई,
सोया था टीवी पर 'गुलामी' देखकर सपने में आज़ादी से मुलाकात हो गई,
मैंने कहा तुम्हारी ६९वीं सालगिरह करीब आ रही है,
पर चेहरे की रंगत में क्यों उदासी छा रही है।

वो बोली सालगिरह तो मेरी हर साल आती है,
उसी दिन तुम सबको आज़ादी की याद आती है,
साल के ३६४ दिन तो तुम्हे ना मेरी सुध आती है,
क्या तुम्हारी आत्मा गुलामी के डर से नहीं थर्राती है।

मैं बोला मैं तो हूँ जन्मा आज़ादी के साए में,
मैं क्या जानूँ क्या होते हैं आखिर गुलामी के मायने,
वो बोली आज़ादी में जन्मा फिर भी इतिहास तो पढ़ा होगा,
तुम क्या जानो कितनों ने अपने लहू से इस आज़ादी को गढ़ा होगा।

गर्व होता है जब सरहद पर प्रहरी को मुस्तैद पाती हूँ,
जो गुजरी निर्भया पर उससे खुद को खोखला पाती हूँ,
दाऊद-अफजल-याकूब ने तो मेरी परिभाषा ही बदल डाली,
सोचती हूँ हमीद-भगत-खुदीराम ने व्यर्थ ही बलि दे डाली।

मैंने कहा बीते ६९ सालों में हमने ग़ुलामी को पीछे छोड़ा है,
तुम्हारी रक्षा हेतु देश में १२५ करोड़ हाथों का जोड़ा है,
कारगिल युध्द हो या कसाब हर दुश्मन का मुँह तोड़ा है,
कल्पना-सायना-अरूंधती ने नई ऊँचाई का अध्याय जोड़ा है।

सीमा पर तैनात सिपाही को तो दुश्मन सामने नज़र आता है,
देश के भीतर बैठे दोस्त-दुश्मन का भेद समझ नहीं आता है,
करकरे-उन्नीक्रृष्णन-बलजीत की शहादत कभी व्यर्थ नहीं जाएगी,
डॉ.एपीजे कलाम की मिसाल हमें संगठित-प्रेरित करती जाएगी।

वह बोली ग़ुलामी शरीर की हो तो आज़ाद हो भी सकती है,
वैचारिक ग़ुलामी तो पूरी नस्ल को स्वाहा कर सकती है,
करना चाहते हो अगर तो विचारों-संस्कारों की क्रांति लेकर आओ,
बिखरते हुए इस देश को अखंडित रखने की आज सब शपथ उठाओ।

इस बात ने मेरे अंतर्मनः को पूरा झकझोर कर रख दिया,
आँख खुल गई अचानक फिर खुद को हक़ीकत से रूबरू कर लिया,
टीवी पर आज भी जब 'ग़ुलामी' आती है तो पूरा लुत्फ उठाता हूँ,
लेकिन किसी भी किस्म की ग़ुलामी से खुद को आज़ाद पाता हूँ।

(स्व-रचित एवं देश को समर्पित, १५ अगस्त २०१५)

© 15th August 2015 Sushil Kumar Sharma
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