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Wednesday, 4 May 2016

नव वर्ष २०१६

बीते हुए लम्हों ने २०१५ का अतीत में विलय कर दिया
भोर की पहली किरण ने २०१६ का उदय कर दिया।

वही सुबह है, वही धूप है, वही शाम का मनोहर दृश्य है
समय नापते हुए कैलंडर ने बदला बस एक ही पृष्ठ है।

आख़िर क्या बदला है ऐसा जो हमें रोमंचित कर रहा
संतोष और संयम का प्रश्न मुझे अचंभित कर रहा।

सब कुछ पा लेने की होड़ में कोई सुखी नहीं दिखता है
मनचाहा मिल जाने पर भी क्यों बेसब्र सा फिरता है।

सफलता-समृद्धि-संपन्नता की आख़िर क्या परिभाषा है
अथाह धन अर्जित कर लेना ही क्या मेरी अभिलाषा है।

बेबसों की बदले त़कदीर, पथ से ना भटके राहगीर
खाली हाथों को मिले रोजी, भूखे पेट को मिल जाए रोटी।

हर सिर पर एक छत हो, हर शरीर को वस्त्र ढके हो
हर हाथ के साथ क़लम हो, इंसानियत ही सबका धर्म हो।

मायूस चेहरों पर लाएं मुस्कान और भर दें उत्साह हर्ष
तब बदलता कैलेंडर लाएगा सबके लिए शुभ नव वर्ष।

(नव वर्ष २०१६ के शुभ आगमन पर एक स्व-रचित अभिव्यक्ति, ०२ जनवरी २०१६)

© 2nd January 2016 Sushil Kumar Sharma
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