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Wednesday, 4 May 2016

बेसबब ज़िंदगी

कुछ इस तरह से गुजर रही है ज़िंदगी
सबब की तलाश में बेसबब हो रही ज़िंदगी।

उनकी एक खबर की ख़ातिर दर-बदर सी रही ज़िंदगी
आज आलम ऐसा कि खुद से ही बेखबर सी ज़िंदगी।

वफ़ा उनसे निभाने को सबको खफ़ा हम किए रहे
तन्हा दिल के साथ आज बेवफ़ा हो रही ज़िंदगी।

ता उम्र बेपनाह मुहब्बत ज़िंदगी जिसे करती रही
सामने पाकर उनको बेज़ुबान सी हो गई ज़िंदगी।

रोज़ जिए जाने की कश्मकश में ऐ दोस्त
मौत के खौफ़ से बेखौफ़ होती ज़िंदगी।

बदलते हालात और बिगड़ते वक्त के दरम्यान
अपनों से बेगानी, बेगानों में अपनी सी होती ज़िंदगी।

(कुछ बयान करने की मेरी एक ईमानदार कोशिश, ०८ नवंबर २०१५)

© 8th November 2015 Sushil Kumar Sharma
All Rights Reserved

4 comments:

  1. Ripe with sentiment. Beautiful composition!

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  2. Thanks for your encouraging words...

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  3. ता उम्र बेपनाह मुहब्बत ज़िंदगी जिसे करती रही
    सामने पाकर उनको बेज़ुबान सी हो गई ज़िंदगी।

    Wah wah

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