कुछ इस तरह से गुजर रही है ज़िंदगी
सबब की तलाश में बेसबब हो रही ज़िंदगी।
सबब की तलाश में बेसबब हो रही ज़िंदगी।
उनकी एक खबर की ख़ातिर दर-बदर सी रही ज़िंदगी
आज आलम ऐसा कि खुद से ही बेखबर सी ज़िंदगी।
आज आलम ऐसा कि खुद से ही बेखबर सी ज़िंदगी।
वफ़ा उनसे निभाने को सबको खफ़ा हम किए रहे
तन्हा दिल के साथ आज बेवफ़ा हो रही ज़िंदगी।
तन्हा दिल के साथ आज बेवफ़ा हो रही ज़िंदगी।
ता उम्र बेपनाह मुहब्बत ज़िंदगी जिसे करती रही
सामने पाकर उनको बेज़ुबान सी हो गई ज़िंदगी।
सामने पाकर उनको बेज़ुबान सी हो गई ज़िंदगी।
रोज़ जिए जाने की कश्मकश में ऐ दोस्त
मौत के खौफ़ से बेखौफ़ होती ज़िंदगी।
मौत के खौफ़ से बेखौफ़ होती ज़िंदगी।
बदलते हालात और बिगड़ते वक्त के दरम्यान
अपनों से बेगानी, बेगानों में अपनी सी होती ज़िंदगी।
अपनों से बेगानी, बेगानों में अपनी सी होती ज़िंदगी।
(कुछ बयान करने की मेरी एक ईमानदार कोशिश, ०८ नवंबर २०१५)
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Ripe with sentiment. Beautiful composition!
ReplyDeleteThanks for your encouraging words...
ReplyDeleteता उम्र बेपनाह मुहब्बत ज़िंदगी जिसे करती रही
ReplyDeleteसामने पाकर उनको बेज़ुबान सी हो गई ज़िंदगी।
Wah wah
Thanks Kaushik bhai...
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