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Wednesday, 4 May 2016

पानी के धारे

पानी के धारे थे दो
अलग बहा करते थे वो
एक दूजे को तकते-तकते
साथ हो लिए बहते-बहते।

सफर पुराना साथी नया
मज़ा सफर का बढ़ता गया
टेड़े मेड़े पथरीले रस्ते
धारा बह चली हँसते-हँसते।

धारा की किस्मत भी ऐसी
कभी उफनती कभी सूखती
उतार-चढ़ाव को अपनाते
बढ़़ी जा रही थकते-थकते।

धारा को तो बहना है
ना थकना ना थमना है
त्याग-समर्पण रखते-रखते
बहते जाओ रमते-रमते।

(सुखद विवाह की सुमधुर २१वीं वर्षगांठ पर एक विचार अपनी हमसफ़र निधी को समर्पित, ०४ दिसंबर २०१५)

© 4th December 2015 Sushil Kumar Sharma
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