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Wednesday, 4 May 2016

होली २०१६

फाल्गुन की पू्र्णिमा पर छटा हो रही न्यारी,
होलिका दहन करते ही रंग खेलने की त्यारी,
अबीर-गुलाल के संग भर के गुब्बारों की झोली,
सबको अपने रंग में रंगती आ गई देखो होली।

बृज में कान्हा घूम रहे लेकर सेना सारी,
किस गोपी को रंगने की अब आई है बारी,
कृष्ण ढूंढें राधा को भिगोने उसकी चोली,
कहे राधे हे गोपाल मैं तो अब तेरी होली।

छोटे थे जब करते थे साथियों के साथ हुड़दंग,
ठंडाई मजा बढ़ा देती थी जब मिलती थी भंग,
फिरते थे फिर गलियों में लेकर अपनी टोली,
सबको रंगकर ये कहना बुरा ना मानो है होली।

पर्व रंगों का हो रहा बेमज़ा पानी के बिना,
पानी की त्राही-त्राही से प्रदेश हो रहा सूना,
ईश्वर से विनती भरे स्वर में है एक ही बोली,
रंगों से हरी-भरी रखना सदा सबकी होली।

(रंगों के इस उत्साहपूर्ण पर्व पर आप सभी को स्व-रचित पंक्तियों के संग बहुत सारी बधाई एवं शुभकामनाएं, २४ मार्च २०१६)

© 24th March 2016 Sushil Kumar Sharma
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