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Friday, 10 June 2016

रिहाई

ये कैसी दुश्मनी कदमों ने मेरे संग है निभाई
ज़मीं तो है थमी सी आसमां ना दे दिखाई।


दिन के उजाले ने किया है मेरे दिल में अंधेरा
अब तो चाँद ने है अपनी चाँदनी भी छिपाई।


सो रहा हूँ कब से अपनी ही मायूसी ओढ़ कर
मुद्दत से किसी ने हसरत की चादर ना बिछाई।


गिरते रहे हैं शाख-ए-उम्मीद से मेरे ख्वाब टूट कर
आँसूओं की बारिश भी दिल-ए-बंजर पे ना रिझाई।


अपनों से बिछुड़ कर हर पल एक सदी सा है बीता
आईने पर उभरती लकीरों ने बची साँसें हैं गिनाई।


होने को मुकम्मल कोई भी आरजू ही ना रही
यह रूह भी इस जिस्म से माँग रही है रिहाई।


(मेरी यह गज़ल हिंदुस्तान और पाकिस्तान में कैद उन सभी 'सरबजीत' के जज्बे को एक सलाम है जिन्हें सिर्फ इंतज़ार है रिहाई का...जेल से या जीने से, मालूम नहीं)