वर्षा ऋतु का हो रहा है आगमन,
वन में मयूर करने लगे हैं थिरकन,
डर से गर्मी की बढ़ गई है धड़कन,
याद आ गया खिलखिलाता बचपन।
वन में मयूर करने लगे हैं थिरकन,
डर से गर्मी की बढ़ गई है धड़कन,
याद आ गया खिलखिलाता बचपन।
बारिश की फुहारें पेड़ों का लहलहाना,
बहती हुई नाली में नाव को तैराना,
बिजली की तार पर बूंदों का आना-जाना,
इतना सुहावना था अपना बचपन।
बहती हुई नाली में नाव को तैराना,
बिजली की तार पर बूंदों का आना-जाना,
इतना सुहावना था अपना बचपन।
बारिश के बाद वो धूप का निकलना,
इंद्रधनुष का पूरे नभ पर छा जाना,
सतरंगी छटाओं को निहारते जाना,
कितना रंगीन था सबका बचपन।
इंद्रधनुष का पूरे नभ पर छा जाना,
सतरंगी छटाओं को निहारते जाना,
कितना रंगीन था सबका बचपन।
बारिश की फुहार से अब ख्वाहिश नहीं जगती,
कुदरत के रंगों में उमंग नहीं दिखती,
जीवन की कश्मकश में रूमानियत नहीं मिलती,
इस से भला था हम सभी का बचपन।
कुदरत के रंगों में उमंग नहीं दिखती,
जीवन की कश्मकश में रूमानियत नहीं मिलती,
इस से भला था हम सभी का बचपन।
(बचपन की बारिश को याद करते हुए कुछ विचार, ०९ जुलाई २०१५)
© 9th July 2015 Sushil Kumar Sharma
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Very nostalgic! Beautifully expressed sentiment.
ReplyDeleteU always appreciate...what to say...thank u so much for the encouragement...
ReplyDeleteYou are a gem. And that's a fact.
DeleteI merely state what's true.
It's your generosity n love for me to say so...
DeleteAbhi barish ka mausam aah raha hai ....superb kavita
ReplyDeleteHaan Kaushik...just to remind...last year ke re-union key baad Deepa ney kaha tha kuchh likhney ko...tab likhee thee...
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